शनिवार, 13 नवंबर 2010

झारखंज का स्वास्थ्य

कोई भी प्रदेश विकास की सड़क पर तभी सरपट दौड़ सकता है...जब वहां के आम लोगों को बुनियादी सुविधाएं नसीब हो....स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे पहली आवश्यकता है, लेकिन झारखंड की तीन करोड़ जनता इस सुविधा से काफी हद तक महरूम है।

प्रदेश की तीन करोड़ जनता का स्वास्थ्य महज 2 हजार सरकारी डॉक्टरों और 4 हजार छोटे-बड़े अस्पतालों के भरोसे है... इस हिसाब से देखें तो एक डॉक्टर के जिम्मे प्रदेश के 15 हजार लोगों की सेहत है.....प्रदेश के ज्यादातर ग्रामीण इलाके में डॉक्टरों को ढूंढ़ना भूसे से सूई ढूंढ़ने जैसा है.... इसकी सबसे बड़ी वजह है कि पिछले दस साल में प्रदेश में एक भी नये मेडिकल कॉलेज का निर्माण नहीं हो पाया.... इस वक्त प्रदेश में हर साल महज 190 डॉक्टर मेडिकल कॉलेज से पढ़कर बाहर निकले रहे हैं.... नर्स और दूसरे पारा मेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है......।

प्रदेश का स्वास्थ्य सूचकांक राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है..... टीकाकरण की दर यहां महज 54 प्रतिशत है जबकि यहां जन्म लेने वाले प्रति 10 हजार में से 59 बच्चों की मौत हो जाती है.... इसी तरह मातृत्व के दौरान प्रति लाख 371 महिलाओं मौत के मुंह में समा रही हैं... मुख्यमंत्री जननी सुरक्षा योजना के तहत माताओं को मिलने वाला लाभ उन तक नहीं पहुंचता....फिलहाल प्रदेश को करीब 4000 अस्पताल की जरूरत है तब जाकर यहां की स्वास्थ्य सुविधा बेहतर होगी।

प्रदेश में पिछले 10 साल में पांच स्वास्थ्य मंत्री और 13 स्वास्थ्य सचिव के पास स्वास्थ्य सेवा की डोर रही...जिसमें से दो स्व्यं डॉक्टर थे...फिर भी स्वास्थ्य महकमें की गाड़ी पटरी पर नहीं आई.... दवा और आरसीएच घोटाले में स्वास्थ्य सचिव से लेकर दर्जनों चिकित्सा पदाधिकारी आरोप के घेरे में है।


इन हताश करने वाली स्थितियों के बीच कुछ अच्छे संकेत भी हैं.... अर्जुन मुंडा सरकार ने मेडिकल कॉलेज खोलने की दिशा में ठोस पहल की है....और उनका ऐजेंडा प्रदेश के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना है... जो प्रदेश के तीन करोड़ लोगों के लिए एक अच्छा संकेत है।

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