शनिवार, 13 नवंबर 2010

सुधारो इस प्रदेश को

झारखंड को विकास की पटरी पर लाना है तो यहां का वित्तीय प्रबंधन मजबूत करना होगा..... शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं लोगों को देनी होंगी।

प्रदेश गठन के बाद इस दिशा में बहुत कम प्रयास हुए, लेकिन इसके भी अपेक्षा के मुताबिक परिणाम नहीं आए.... अब तक जितनी राशि खर्च हुई, उसके अनुरूप परिसंपत्ति का निर्माण तक नहीं हुआ... उलटे लोगों पर बोझ बढ़ गया। राज्य के गठन के समय एक झारखंडी पर लगभग दो हजार रुपए का कर्ज था...जो 10 साल में बढ़कर करीब नौ हजार हो गया.... 15 नवंबर 2000 को झारखंड पर 5962 करोड़ रुपए का ऋण था... आज यह 28 हजार करोड़ तक पहुंच गया है....इसकी तुलना में 10 साल के दौरान करीब 14 हजार करोड़ की ही परसंपत्ति का निर्माण हुआ।

राज्य योजना मद से विकास के लिए 38,763 करोड़ रुपए खर्च हुए... जबकि जरूरत 53 हजार 424 करोड़ की थी.... दूसरे राज्यों की तुलना में झारखंड की वर्तमान तस्वीर देखने का यहीं सही वक्त है.... 2000 में झारखंड देश के अमीर राज्यों में शामिल था... लेकिन समय के साथ स्थिति बदल गई.... 2001-02 में झारखंड की राजस्व आमदनी इसके साथ गठित छत्तीसगढ़ से अधिक थी लेकिन 2008 आते आते छत्तीसगढ़ ने झारखंड को पछाड़ दिया।

अब इसके आकलन का वक्त आ गया है.... देश के कुल खनिज भंडार का 40 फीसदी हिस्सा झारखंड में है.... कुल क्षेत्रफल के 30 फीसदी हिस्से में जंगल है.... पहले से ही यहां कई बड़े उद्योग हैं.... योजनाबद्ध तरीके से अगर इनका इस्तेमाल किया जाए तो राज्य पटरी पर आ सकता है..... इसके लिए बस राजनीतिक दूरदर्शिता और विकास के संकल्प की जरुरत है।

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