सुना था दरख्तों के नीचे छांव होती है, हम तो बबूल के साए में आके बैठ गये.... दुश्यंत कुमार की ये गजल फिलहाल झारखंड के लोगों की नियती लगती है.....लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता.... और झारखंड एक विकसित राज्य नहीं बन सकता.....।
कहते हैं सुराख तो आसमान में भी हो सकता है, बस एक पत्थर तबियत से उछालने की देरी है...और जिस दिन ये देरी खत्म हो गई उसी दिन झारखंड विकसित राज्यों की कतार में सबसे अव्वल नंबर पर नजर आएगा।
प्रदेश की सालाना आय लगभग बारह हजार एक सौ पच्चीस करोड़ रूपये हैं....औऱ खर्च महज नौ हजार आठ सौ करोड़....यानि की सालाना दो हजार तीन सौ पच्चीस करोड़ रूपये का सरपल्स....जरूरत है तो बस इसी सरपल्स के सही इस्तेमाल की... हम आज ये बात नहीं करेंगे कि जिस प्रदेश के पांच दो हजार करोड़ का सरप्लस हो वो पच्चीस हजार करोड़ का कर्जदार कैसे हो गया.... हम बस इसके उस स्वर्णिम भविष्य की बात करेंगे...जिसका वह हकदार है....।
अर्जुन मुंडा सरकार ने इसके लिए पहल शुरू कर दी है....प्रदेश में पहली बार पंचायत चुनाव हो रहे हैं... पंचायत चुनाव होने के बाद उन इलाके में विकास की रफ्तार तेज होगी जो अभी तक इससे कोसो दूर थी....।
झारखंड खनिज संपदा से परिपूर्ण राज्य है....औऱ यहां उद्योग धंधे का जाल भी बिछा हुआ है....लेकिन इस क्षेत्र में अभी नहीं के बराबर काम हुआ है....एनटीपीसी, आर्सेलर-मित्तल, वेदांता, टाटा जैसे औद्योगिक घरानों के साथ-साथ कई विदेशी कंपनियां अगले दो से तीन साल में प्रदेश में लाखों करोड़ का निवेश करने जा रही है....इस निवेश से न केवल प्रदेश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि इससे होने वाली आमदनी की वजह से राज्य सरकार आम लोगों के लिए लोकहित योजनाएं भी बना सकेगी.....।
खाद्यान के मामले में मामले में झारखंड के खेतों में जरूरत के हिसाब से अनाज का उत्पादन भले ही नहीं होता हो... लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां उत्पादन बढ़ाने की कोई संभावना नही है....नई तकनीक और सिंचाई की सुविधा बढ़ाकर इस समस्या को आसानी से दूर किया जा सकता है....जरूरत है तो बस इक इरादे की....जो इस प्रदेश को अंधेरे से निकालकर रोशनी की ओर लेकर चले।
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