शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

सबसे बड़ा पाप

किसी के मुंह से निवाला छीनना सबसे बड़ा पाप है.... और ये पाप हो रहा है अपने देश में.... इस सबसे बड़े पाप में किसी एक शख्स की भागीदारी नहीं है... कोई एक व्यक्ति अकेले इस पाप के लिए जिम्मेदार नहीं है....बल्कि पूरा का पूरा सिस्टम इस पाप में बराबर का हिस्सेदार है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के मुताबिक जिस व्यक्ति के पास जनवितरण प्रणाली के लिए राशन कार्ड है...उस व्यक्ति को चार रूपए 96 पैसे प्रति किलोग्राम की दर से पैंतीस किलोग्राम अनाज हर महीने मिलना चाहिए... लेकिन शायद ही साल के बारह महीने किसी भी राशनकार्ड धारी को इस दर पर इतना अनाज मिलता हो... एक सर्वे के मुताबिक बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और मध्यप्रदेश में जनवितरण प्रणाली की हालत बदतर स्थिति में है।

हर महीने राशन कार्ड धारियों के लिए 4.20 मिलयन टन चावल और गेहूं का आवंटन होता है..... जनवितरण प्रणाली के जरिये गरीबों को बांटने के लिए आने वाला ये अनाज राशनकार्ड धारियों को न केवल अधिक कीमत चुकाने के बाद मिलती है, बल्कि ज्यादा पैसे देने के बाद भी उन्हें इतना अनाज नहीं मिलता जिससे पूरे महीने तक उनके घर चुल्हा जल सके।

दिलचस्प बात ये है कि गली मोहल्ले में जनवितरण प्रणाली के जो डिलर है.... उनमें से ज्यादातर डीलर अपनी खुद की या रिश्तेदार के जरिये राशन दुकान चलाते हैं....औऱ जो सरकारी अनाज आता है... धड़ल्ले से उसकी ब्लेक मार्केटिंग करते हैं.... प्रखंड विकास पदाधिकारी या फिर ब्लॉक लेवल के वैसे अधिकारी जिनपर ये जिम्मेदारी है कि वो राशन डीलरों पर नजर रखे... लापरवाही बरतते हैं या फिर उनमें से ज्यादातर भ्रष्ट है।

प्रखंड स्तर से शुरू हुआ लापरवाही और भ्रष्टाचार के इस खेल का सिलसिला डिस्ट्रिक लेवल और स्टेट लेवल तक जारी है.... ऐसे में देश के सबसे पुरानी जनवितरण प्रणाली की सफलता की बात करना बेमानी हो जाती है....।

देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है अपना बिहार.... शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और सड़क से पहले यहां के लोगों की जो मुलभूत जरूरत दो वक्त की रोटी है वो भी पूरी नहीं हो पा रही है..... केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाएं जमीन पर हकीकत बनती नजर नहीं आती..... जनवितरण प्रणाली जो सबसे पुरानी योजना है...वो आज तक इस प्रदेश में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है।

वैसे गरीब परिवार जो बाजार दर पर दो वक्त के लिए अनाज नहीं खरीद पाते... उनलोगों को सरकार की तरफ से तीन तरह के कार्ड जारी किये गये है....एपीएल, बीपीएल और एएवाई ....प्रदेश में इस वक्त 39 लाख 74 हजार, 448 एपीएल कार्ड धारी...... और 52 लाख, 15 हजार, 982 बीपीएल कार्ड धारी हैं जबकि यहां 24 लाख 13 हजार 444 अंत्योदय अन्य योजना के लाभार्थी हैं....तीन योजनाओं के लाभार्थियों की कुल संख्या मिला दी जाए तो बिहार में ये संख्या 1 करोड़ 16 लाख 3 हजार 874 है।

सुप्रीम कोर्ट की निर्देश के बाद हुए सर्वे में जो रिपोर्ट सामने आई है... उसमें ये बात सामने आई है कि बिहार में जनवितरण के लिए जो अनाज आता है उसका महज 66.20 फीसदी हिस्सा ही लोगों तक पहुंच पाता है.... महज पचहत्तर फीसदी लोगों को जनवितरण प्रणाली से अनाज मिलता है, हालांकि इसमें भी क्वालिटी और क्वांटिटी की कोई गारंटी नहीं होती।

यहां कभी समय पर औऱ पूरा अनाज नहीं मिलता...जबकि सरकारी रिकॉर्ड में सौ फीसदी अनाज का खर्च दिखाया जाता है.... अनाज की जो कीमत तय की गई है उसपर अनाज मिलना यहां सपने की बात है....जबकि महज पचहत्तर फीसदी लोगों को राशन दूकान से अनाज मिल पाता है।

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