गुरुवार, 19 मई 2011

और, क्या दूं ?



खाली-खाली
घर मेरा,
साज-ओ-सामान से भरा ।

मन मेरा
आंखे मेरी,  
पर सपने तेरे खड़े-खड़े।
गली-गली
ढूंढ़ता हूं
पूछता हूं तेरा पता
पर अपनी मंजिल मालूम नहीं।
धरती
आकाश
जिंदगी-मौत
परिभाषाएं सब मालूम है,
इंतजार है फिर भी
लौट आएगी-लौट आएगी।  
वक्त दिया
जिंदगी दी
सपने सारे गंवा किया,  
सोचता हूं
और, क्या दूं
और, क्या दूं ?

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