मंगलवार, 17 मई 2011

वक्त...

वक्त...किसका है ये ?
“उसका”
जिसके इंतजार में हूं “मै”
या खराब है उसका “वक्त”
जिसके हाथों से
फिसलता जा रहा हूं मैं
पल-पल दूर हो रहा है जो मुझसे।

वक्त...
खो देगा वह सबकुछ
और, फिर पछताएगा ताउम्र
एक दिल तोड़ने के लिए
प्यार से भरा दिल छोड़ने के लिए
अपनी ही जिंदगी से
रार करने के लिए।

वक्त... नहीं है उसे ये एहसास
क्या हो रहा है उसके साथ
सफलता, दोस्ती, रंगीनियत
लगता है सब है उसके पास
लेकिन, वो नहीं जानता
इस भीड़ में भी
कितना तन्हा है “वो”
वक्त एक दिन बताएगा उसे
इन पलों को खोने की सच्चाई।

वक्त... नहीं देखता
पीछे मुड़कर
इंसान देखता है
पीछे मुड़कर
वक्त कभी नहीं सोचता
अपने आगे बढ़ने के फैसले पर
इंसान हमेशा पछताता है
पीछे छूट गए वक्त को सोचकर।

वक्त
नहीं देता संभलने का मौका
करता है वो चंद इशारे
समझदार समझ लेता हैं
नासमझ पहचानता नहीं।
ताउम्र ढोंग के खोल में
बंद होकर अपनी बघारता है
और, जब हवा निकल जाती है
चंद सांसों के लिए
वास्ते पर वास्ता देता है।
पर,
वक्त...।

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