बुधवार, 25 मई 2011

एक जंग, मशीन के खिलाफ


सड़के सूनसान हैं..... कुछ दिनों पहले तक पत्थर तोड़ने की आवाज यहां दूर से ही सुनाई देती थी....क्रेशर मशीन से निकलने वाली धूल फिजां में फैली होती थी....मजदूरों का आना जाना....ट्रकों और जेसीबी मशीन की घड़ घड़ यहां आम बात थी.....लेकिन अब यहां सन्नाटा पसरा है....ट्रकों के पहिए थम गए हैं....क्रेशर मशीन के पेट से अब यहां पत्थर के टूकड़े नहीं निकलते.....।

ये इलाका है दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के कुलकुली डंगाल का....जहां पत्थर उद्योग की वजह से सैकड़ों परिवारों को रोजी रोटी मिलती थी....लेकिन ऑटोमेटिक क्रेशर मशीन के आ जाने के बाद से मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया....मशीन ने मनुष्य का रोजगार छीन लिया..... रोजगार खत्म होने के बाद जब इन लोगों के पास भूखों मरने की नौबत आ गई तब इन लोगों ने मशीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया....।

दुमका के शिकारीपाड़ा प्रखंड के कुलकुली डंगाल, गोसाय पहाड़ी और रामजाम इलाके के नक्सल प्रभावित इस इलाके में तीन सौ से ज्यादा ऐसे उद्योग हैं....जहां के लोग बड़ी संख्या में बेरोजगार हुए हैं... स्थानीय लोगों की इस परेशानी से स्थानीय प्रशासन को कोई मतलब नहीं है और बड़े अधिकारी हैं....कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है।


उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी दुमका के ही हैं....उन्हें जब इस समस्या के बारे में बताया गया तो उनका कहना था कि मजदूरों की मांग जायज है....और वो अपने स्तर से इस मामले को हल करने की कोशिश करेंगे।


उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आश्वासन से मजदूरों में उम्मीद तो जगी है....लेकिन मशीन से उनकी लड़ाई कब खत्म होगी और उन्हें रोजगार कब मिलेगा कोई नहीं जानता....फिलहाल मजदूरों का आंदोलन जारी है...भूख के खिलाफ बेरोजगारी के खिलाफ।


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