किसका है ये तुमको इंतजार, मैं हूं ना....किसी हिन्दी फिल्म का बेहद लोकप्रिय गीत है...इस गीत की रचना फिल्म में नायक की भूमिका को देखकर लिखी गई होगी....उसका फिल्मांकन भी उसी अनुरूप किया गया होगा....लेकिन अगर मैं हूं ना के “मैं” पर गौर करें और इसे व्यापक अर्थ में देखें तो....”मैं” का कई अर्थ निकल सकता है....।
अहम ब्रह्मोसी...यानी मैं ही ब्रह्म हू...वो ब्रह्म जिसकी सार्वभौम सत्ता है....जो शून्य से शुरू होता है और अनंत पर खत्म.....अर्थात, जिसका न तो आरंभ है और न अंत। यानि इंसान के अंदर ही उसका मैं है और वो किसी का इंतजार करता है....एक ऐसे मैं की जिसकी कोई आवश्यकता नहीं....जिसका कोई वजूद नहीं...।
”मैं” को समझने के लिए आपको अपने अंतर में झांकना होगा...देखना होगा कि आप जिस खुशी के लिए, जिस उद्देश्य के लिए...जिस लक्ष्य के लिए...जिस किसी भी चीज के लिए किसी दूसरे मैं की तलाश में हैं वो आपके अंदर ही है...बस उस ”मैं” बाहर निकालकर अपने सामने रखिए...अर्थात उस ”मैं” की कल्पणा को यथार्थ समझिए...उस अनुरूप कार्य कीजिए आपका वो ”मैं” जिसके इंतजार में आप हैं आपको जरूर मिलेगा...जरूर मिलेगा..।
सब समझ का फर्क है... आप हमेशा किसी की तलाश में रहते हैं....वो तलाश जो हमेशा अधुरी रहती है....ये तो एक सीढ़ी मात्र है जिसपर चढ़ते हुए आप दूसरे तलाश की ओर भटकते हुए आगे बढ़ते हैं... गौर से देखिए, आपको आपके अंतर में ही उस ”मैं” का उत्तर मिलेगा जिसकी आप तलाश में हैं... खुशी भी एक ऐसी ही तलाश है..जिसकी खोज में इंसान युगों-युगों से भटकता रहा है.....और उसकी तलाश हमेशा अधुरी रह जाती है....ये तो कस्तुरी मृग की भांति आपके अंतर में है जिसे कहीं और तलाश करने की जरूरत नहीं है...बस समझने की जरूरत है....।
ता उम्र इंसान एक ऐसे शख्स के इंतजार में रह जाता है....जिसके बारे में वह सोचता है कि उसके साथ रहने पर उसे सुकून मिलेगा...उसका पलभर का साथ उसके सारे दुख दूर कर देगा.... उसका प्यार भरा स्पर्श उसे स्वर्ग की अनूभुति देगा...लेकिन हममें से ज्यादातर लोग वैसे शख्स की तलाश में पूरी जिंदगी गूजार देते हैं...लेकिन वो शख्स कहीं मिलता नहीं....जनाब, इंसान कोई पारस पत्थर नहीं, जिसके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता हो...इंसान तो इंसान है....हर किसी के अंदर बिल्कुल आप की तरह ही हंसने की, रोने की, दुख की, सुख की, आगे बढ़ने की, पीछे हटने की, ख्वाहिशों की, सपनों की चाहत और वजह है... इसलिए हमेशा दूसरों में कुछ तलाशने वाले व्यक्ति को वैसा ही व्यक्ति मिलता है...जो बिल्कुल आप जैसा ही कुछ तलाश कर रहा होता है....इसलिए किसी व्यक्ति के अंदर “पारस” तलाशने से बेहतर है आप खुद पारस बनें और जो आप के पास है, आपकी तरह का है...जिसको आपको फिक्र है... उसे ही अपने अनुसार ढालने की कोशिश करें...आप खुद पारस बनें और उसे सोना बनाकर अपने पास ऱख लें....यकीन मानिए आपको दर-दर भटकने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।
मेरी मानिए...अपने दिल की मानिए....नहीं तो ऊपरवाले की मानिए...इधर-उधर भटकने से अच्छा है... खुद कहिए “किसका है ये मुझको इंतजार, मैं हूं ना”....। खुद को पहचानिए, पारस बनिए और आस पास सोने जैसे लोगों के साथ रहिए....कभी किसी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा...आपकी हर तलाश खुद आपको तलाशते हुए आपके दरवाजे पर दस्तक देगी।

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