पांच बरस बीत गए
वो बात गई-वो बात गई !
एक लम्हा था
जो बीत गया
वो गाड़ी कब की चली गई,
बारिश की बुंदों ने कब का
धो डाला-उस राह में पड़े
कदमों के निशां।
क्या, लम्हा था
जो बीत गया ?
पर छोड़ गया-जख्मों को हरा
एक टीस उभर-उभर आती है
उसकी याद दिलाती है !
उस दिनांक का हर फ्रेम
यहां-वहां चस्पा सा है
आंशू की बुंदें बन-बन
पलकों से ढलक वो जाता है।
पांच बरस बीत गए
वो बात गई-वो बात गई !
कुछ और बरस बीत जाएंगे,
कुछ लोग नए आ जाएंगे
कुछ और बात हो जाएगी।
पर, खत्म कहां होगी वो बात
वो जख्म कहां भर पाएगा ?
आईना जब भी देखूंगा
वहां “मैं” ही “मैं” नजर आऊंगा।
सोचा था पुरानी यादों पर
नए वक्त का लेप चढ़ेगा !
मिट जाएंगे दाग सभी
जब नया वक्त मुस्काएगा,
ताजा हवा के झौंके से
गम पुराने गुम हो जाएंगे ।
लेकिन, नहीं बदला कुछ भी
फिर-फिर “मैं” वहीं पहुंच गया
जहां-इतिहास खुद को दोहराता रहा।
बरस-दर-बरस बीत रहे
इतिहास नया होता रहा
जख्म हरे के हरे रहे
मैं वहीं “शुन्य” होता रहा।
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