ठहर जरा
अल्प विराम पर,
तू दे थोड़ा सा ध्यान
पूर्ण विराम पर,
जब खत्म हो जाए परिच्छेद
तू सोच जरा सा।
तू सोच जरा सा
मेरे शब्दो के दर्द को,
तू समझ जरा सा
मरे मन की पीड़ा को।
पूर्ण नहीं तो अल्प सही,
दिल नहीं तो दिमाग से सही लेकिन तू सोच जरा सा।
साथ नहीं तो क्या हुआ
पास नहीं तो क्या हुआ
जी लेंगे हम दोनों
पूरी उम्र, यूं ही बिलख-बिलख।
हां, ये सच है, तुम्हें नहीं होगा
उस दर्द का एहसास “फिलहाल”
लेकिन ये फिलहाल कभी तो आएगा ?
कभी तो तुम्हे भी होगा आभाष ?
कि, शब्दों में हमेशा तुम ही ढलती रही हो
जब भी सफे पर उतरी
मुस्कराती हुई या रोती हुई
हर बार तुम्ही थी, तुम्ही थी ।।
तू सोच जरा सा
हर बार तुम्ही क्यों थी ?
तुम्ही क्यों थी ?
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