अब चलता हूं मैं
तुमको जानना बाकी नहीं रहा
खुद को समझने के लिए
अब चलता हूं मैं।
क्रमशह ने मेरी जिंदगी को
खूब ही संभाला है
मेरी तमन्नाओं के गुंचे
रोज ही तका करती थी तुमका
फिर मेरी ही आंखों ने देखा
तेरी बेरूखी और उन गुंचों को मसला जाना
मसले हुए फूलों की
खुशबू टटोलने के लिए
अब चलता हूं मैं।
तेरी नादानियत
मेरी कविता का उम्र बढ़ाती रही
तुम्हारे अंजान बने रहने का ढोंग
मेरे जुनून को हवा देता रहा
मेरी आहों के तुफां को
तेरी चुप्पी दबाती रही
मेरी कविता का हर एक शब्द
तेरा ही नाम लेता रहा
इन बेअसर जज्बों की
मौत भी देखो कैसी रही
जब भी तेरे लवों से गुजरा
इनकी हस्ती मिटती गई।
उन जज्बों की औकात ही क्या
जो अपने मतलब के लिए आहे भरे
उन सूखे फिजुल शब्दों का
मर जाना ही अच्छा
जिसको अपनी अहमीयत का अहसास नहीं
हिचकियां भरते चंद ऐसे
शब्दों को मारने के लिए
अब चलता हूं मैं
मुझको हमेशा ही
खुद से शिकायत सी रही है
तेरे सामने आने पर
शब्दों का जैसे अकाल सा पड़ गया हो
तुमसे रूबरू होने के लिए
मेरे शब्दों ने हमेशा कागज का बांह लिया
पुरजोर कोशिश में रहा फिर
तुम्हे अपना बनाने को।
अपना बनाने में कभी तुम भी
“शिफर” को “ईश” बना गई थी
आज जब “ईश”
अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रहा है
अपने फैसले पर उसे
तुमने त्रिशंकू बना रखा है
तुम्ही कहो क्या करूं ऐसा कि
ये फैसला मेरे ही हक में हो
अपना हक जताने के लिए
अब चलता हूं मैं ।
अपने कविता के ऐसे उपंसहार के लिए
शुरू से ही मैं तैयार था
बस अंजाम की तारीक पक्की करने को
अब तक मैं चलता रहा...
मैं मानता हूं
मज्मून-ए-उल्फत का आगाज
अपनी नहीं सिर्फ मेरी थी
लेकिन तेरी दिल्लगी का पंख लगाकर
मेरे अरमानों का सफर
...अब तक जारी रहा।
आज मुझे खुद को जानने की जरूरत है
मेरी कविता को अब तक
नपुंसकता का बोध कराती आई हो तुम
इन अक्षरों को पढ़ने के बाद
किसी नाटक के उम्दा पात्र सी लगी तुम
अपने दिल को समझाते-समझाते
थक गया हूं मैं
बर्बाद-ए-दिल को तोड़ने के लिए
अब चलता हूं मैं।
इन कविताओं ने
मुझको दिया ही क्या है ?
नाकामियां, उदासियां जैसे शब्दों का
अंबार भर हैं ये शब्द
तेरी ईबारत में लिखा गया हर एक शब्द
“काफिर” करार देता रहा मुझको।
दिल कुरेदने वाले लफ्ज
तेरे जेहन में कभी दम भी न ले सका।
मेरी कविता
जब भी छूती थी तेरे लवों को
तुम ठहरती उसी जगह पर
जहां दुनियां हंसती थी मुझपर,
आज ये कविता
तेरे आंखों का पानी मांगती है
आखिरी सांस गिन रहे इस बेमुराद की
आखिरी इच्छा तुम्हें परिणीता बनाने की थी
झूठी मान के खातिर ही सही
कुछ पलों के लिए ही सही
तुम रुदाली तो बन जाओ
अपनी कविताओं की अर्थी उठाने के लिए
अब चलता हूं मैं।
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