बुधवार, 14 सितंबर 2011

फिराक़ गोरखपुरी


ये नर्म-नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चिराग.....तेरे ख्याल की खुशबू से बस रहे हैं दिमाग... दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूं आई....जैसे जगमगा उठे मंदिरों में चिराग....।

मेरे अंदाज-ए-बयां से तो आपने पहचान ही लिया होगा कि आज हम किस शख्सियत से रूबरू होंगे, किस महान शायर के बारे में आपसे गुफ्तगू करेंगे,  हां जिन लोगों ने उन्हें पहचाना न हो उनके लिए बता दूं, कि आज हम बात करेंगे- फिराक गोरखपुरी की। जो पैदा तो हुए थे गोरखपुर में लेकिन इलाहबाद के होकर रह गए.....शायरी ऐसी लिखी की सब उनकी शायरी के गुलाम बन कर रह गए... जरा देखिए फिराक गोरखपुरी का अंदाज-ए-बयां 

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों
जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था।

फिराक गोरखपुरी का पूरा नाम-रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी था... उनका जन्म उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के लक्ष्मी भवन में 28 अगस्त 1896 को हुआ था। अपने समय के मशहूर शायर गोरख प्रसाद इबरत के सुपुत्र फिराक साहब ने अपने जीवन में जो कुछ सीखा, वह सब अपने पिता से सीखा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उस समय के रीति-रिवाज के अनुसार उर्दू और फारसी में घर पर ही हुई। 1913 में हाई स्कूल, फिर इण्टर के बाद उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले गए। 29 जून 1914 को उनका विवाह मशहूर जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। स्नातक शिक्षा के बाद 1918 में फिराक साहब ने आई.सी.एस. की परीक्षा पास की। उन्हें डिप्टी कलेक्टरी दी गयी, लेकिन 1920 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडे... डे़ढ साल जेल में रहे..... जेल में मुशायरे भी होते थे... फिराक ने कई गजलें इसी जेल में कहीं... जरा ग़ौर फरमाइए...
"अहले जिन्दा की यह महफिल है सुबूत इसका 'फिराक'
कि बिखर कर भी यह शीराजा परीशां न हुआ।
खुलासा हिन्द की तारीख का यह है हमदम
यह मुल्क वकफे-सितम हाए रोजगार रहा।
जेल से छूटने के बाद फिराक साहब को जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस के इलाहाबाद के दफ्तर में अण्डर सेक्रेटरी की जगह दिला दी। फिराक 1923 से से लेकर 1927 तक इस पद पर रहे। इस बीच वह नेहरू परिवार के बहुत करीब आ गये। वह नेहरू के सियासी चिंतन और बौद्घिक व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए और नेहरू को सियासत का गुरू कहने लगे। नेहरू को शायरी का काफी शौक था। अक्सर वह फिराक से शेर सुनते और आजादी के संघर्ष की बातों के माध्यम से भारत के इतिहास व संस्कृति पर विचार विमर्श भी करते। नेहरू के करीब होने से फिराक जो चाहते वह बन सकते थे, लेकिन उन्होंने ऎसा नहीं किया। इस बीच उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से प्राइवेट अंग्रेजी में एम.ए. किया और 1930 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग में प्रवक्ता हो गये और शेरो-शायरी में डूब गये.... फिराक साहब अपनी लेखनी में बेहद गंभीर थे....उनकी गंभीरता का अंदाज उनकी शायरी से ही पता चलता है...जब वो लिखते हैं...
जाओ न तुम हमारी इस बेखबरी पर कि हमारे
हर ख्वाब से इक अह्‌द की बुनियाद पड़ी है।
1918-19 के मध्य उन्होंने शायरी की शुरुआत की। प्रारंभ में उन्होंने अमीर मिनाई के शागिर्द वसीम खैराबादी से इस्लाह ली और लगभग 1940 तक उसी शेरी परम्परा से प्रभावित रहे जो शैली अमीर मिनाई के नाम से जानी जाती है। लेकिन वह अपने लहजे की तलाश में थे। अमीर स्कूल ने उन्हें सिर्फ फन और शैली की कुछ खुली हुई राहें दिखायीं थीं।

फिराक गोरखपुरी की शायरी जीवनरूपी भी है और जीवनदायी भी। उनकी शायरी में इसी धरती की मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू मिलती है, जिसमें वह पले-बढे और जिंदगी का सफर तय करते रहे, इसी में भारतीयता भी है। इसमें मानव जीवन हंसता, चहकता, सिसकता, संघर्ष करता और सोच-विचार करता हुआ सत्य की खोज करता हुआ दिखाई पडता है। इसी का परिणाम है कि उनकी शायरी अपना एक अलग स्वाद और स्वभाव रखती हैं, जो अपनी ओर आकर्षित करती है, प्रभावित करती है और बहुत कुछ विचार करने पर विवश करती है.... जरा देखिए उनकी इन पंक्तियों को-
शाम भी थी धुआं-धुआं, हुस्न भी था उदास-उदास
दिल को कई कहानियां याद सी आ के रह गई।
हर शायर की तरह फिराक गोरखपुरी साहब की लेखनी भी मोहब्बत के रस में सबसे ज्यादा सराबोर रही। उनकी रुबाइयों में टूटकर मोहब्बत करने वाली हिंदुस्तानी औरत की ऐसी खूबसूरत तस्वीरें मिलती हैं... जिनकी मिसाल मुश्किल से मिलेगी, जरा ध्यान से सुनियेगा...
निर्मल जल से नहा के रस से निकली पुतली,
बालों में अगरचे की खुशबू लिपटी।
सतरंग धनुष की तरह हाथों को उठाये,
फैलाती है अलगनी पर गीली साडी॥
फिराक साहब की कविता में सौन्दर्य के बड़े कोमल और अछूते अनुभव व्यक्त हुये हैं….उनका एक शेर है:-
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर, फिर भी
ये हुस्नों इश्क धोखा है सब, मगर फिर भी।
ऐसा नहीं है कि फिराक़ साहब ने सिर्फ और सिर्फ हुस्न और इश्क पर ही कलम चलाई हो.... 1962 में जब चीन के साथ लड़ाई चल रही थी तो उनकी एक गजल खूब मशहूर हुई।
सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुये
सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात।
1970 में में उनकी उर्दू काव्यकृति गुले नगीमाके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किया गया। रूहे-कायनात, नग्म-ए-साज, गजालिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुल बाग, रम्ज व कायनात, चिरागां,  शोला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधी रात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फिराक साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया के साथ-साथ कई कहानियाँ भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी इन तीनों भाषाओं में उनकी दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुई है।
 
फ़िराक़ गोरखपुरी की शादी 1914 में ही हो गई थी... लेकिन वो अपनी शादी से कभी खुश नहीं रहे.... वो अपने विवाह को अपने जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना मानते थे....उनको जानने वाले कहते हैं वे अपने दुखों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे शायद यही वजह थी उन्होने 75 साल की उम्र में लिखा
मेरी जिन्दादिली वह चादर है ,वह परदा है, जिसे मैं अपने दारुण जीवन पर डाले रहता हूँ। ब्याह को छप्पन बरस हो चुके हैं और इस लम्बे अरसे में एक दिन भी ऐसा नहीं बीता कि मैं दाँत पीस-पीसकर न रह गया हूँ। मेरे सुख ही नहीं, मेरे दुख भी मेरे ब्याह ने मुझसे छीन लिये। पिता-माता, भाइयों-बहनों, दोस्तों- किसी की मौत पर मैं रो न सका।
फिराक साहाब को अपनी मां का प्यार नहीं मिला....मां के प्यार के लिए वो हमेशा तरसते रहे....अपनी मां के लिए लिखी उन पंक्तियों को पढ़कर शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके आंशू न निकल आए... जरा आप भी सुनिए...
कभी-कभी तो मेरी हिचकियाँ -सी बँध जातीं
कि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँ
और उसको राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँ
दिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताब
कहूँ कि पढ़ के सुना तू मेरी किताब मुझे
फिर उसके बाद दिखाऊँ उसे मैं वो कापी
कि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिसमें
वे हर्फ़ थे जिन्हें लिक्खा था मैंने पहले-पहल
फिराक साहब के बारे में कई किस्से मशहूर हैं.... एक किस्सा आपको भी बता दूं.... एक बार की बात है, फिराक़ गोरखपुरी साहब मुंबई गए थे...फिल्मी दुनिया में भी उनका डंका बचता था, सो उनके लिए एक पार्टी रखी गई....इत्तफाक की बात है कि उस वक्त सारे फिल्मी धुंरधर या तो पंजाबी थे या फिर बंगाली...बी आर चोपड़ा, दिलीप कुमार, विनोद खन्ना और शम्मी कपूर जैसे स्टार थे वहां...पार्टी शुरू ही हुई थी कि कुछ देर बाद सारे फिल्मी कलाकार पंजाबी में बात करने... थोड़ी देर फिराक़ साहब सब झेलते रहे...फिर उन्होंने दिलीप कुमार को बुलाया और उनसे कहाअमे युसूफ, सोचता हूं पंजाबी सीख ही डालू। इस पर दिलीप कुमार ने कहा ऐसा क्यों...तो फिराक साहब ने जवाब दिया- भई बूढ़ा हुआ, मरने की उम्र आई। सारी जिन्दगी गुनाहो में गुजरी है. जाहिर है जहन्नुम ही नसीब होगी। इसलिए सोचता हूं वहां की ऑफिशियल लैंग्वेज सीख ही लूं... ऐसे थे अपने फिराक गोरखपुरी साहब....।  

फिराक़ एक बेहद मुँहफट और दबंग शख्सियत थे। एक बार वे एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे, काफी देर बाद उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया। फिराक़ ने माइक संभालते ही चुटकी ली और बोले, 'हजरात! अभी आप कव्वाली सुन रहे थे अब कुछ शेर सुनिए'..... इसी तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोग हमेशा फिराक़ और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को लड़ा देने की कोशिश करते रहते थे। एक महफिल में फिराक़ और झा दोनों ही थे। एक साहब दर्शकों को संबोधित करते हुए बोले, 'फिराक़ साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं" इस पर फिराक़ तुरंत उठे और बोले, "भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक ख़ास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते"। फिराक़ की हाज़िर-जवाबी ने उन हज़रत का मिजाज़ दुरुस्त कर दिया

दीपावली के लिए फिराक गोरखपुरी ने  'रूप' की स्र्बाइयां... एक भारतीय वधू को जहन में रख कर लिखी हैं.... जरा सुनिए इन रूबाइतों को
दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने, जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पे लिए नर्म दमक
बच्चों के घरौंदे में जलाती है दिए।
फिराक साहब के निकट जब मृत्यु आयी.... तो उनकी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का  सूर्य चरमोत्कर्ष पर था लेकिन वह सूर्य डूबा नहीं, उसे फिराक की शायरी का अमृत मिल गया... 3 मार्च 1982 को उनकी मृत्यु जरूर हुई.... लेकिन वो शायरी की दुनिया में अमर हो कर रह गए...अपने अंतिम दिनों में उन्होने लिखा था...
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ, आओ सँभालो साजे़-गजल,
नये तराने छेडो़, कि मेरे नगमों को नींद आती है।
फिराक़ गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र का वो जगमगाता सितारा हैं जिसकी रौशनी आज भी शायरी को एक नया मक़ा दे रही है। इस अलमस्त शायर की शायरी की गूँज हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।  बकौल फिराक़
'ऐ मौत आके ख़ामोश कर गई तू,
सदियों दिलों के अन्दर हम गूंजते रहेंगे'



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें