सन्नाटा....
रात का गहरा साया,
स्याह अंधेरा
लंबी अंधेरी पत्थर की गली,
शांत हवा में घुली तन्हाई की बदबू
बंद खिड़की और दरवाजा
दूर किसी ठूंठ पर बैठा उल्लू
देख रहा है एक “जीवन” ।
“जीवन” जो डूबा है
इच्छाओं के आगोश में
बेमौसम तुफान से पैदा हुए “भंवर” में।
पूछता है उल्लू अपने आका से
अमर कौन है ?
जीवन- जो संगम है,
माया का, ख्वाहिशों का और सृष्टि का,
या फिर वो भंवर
जिसकी चपेट में
दम तोड़ती माया है
जो ख्वाहिशों का कब्र है
सृष्टि का जहां सृजन नहीं विनाश होता है।
जवाब मुश्किल था
आका ने फिर भी दिया
कहा- मेरे प्यारे उल्लू
न तो भंवर अमर है, न सृष्टि !
कुछ भी चिरस्थाई नहीं है
न मैं और न तुम,
अगर कुछ स्थाई है
तो चंद सवालात
जो हर युग में, हर काल में
पूछा गया और जिसका जवाब हर कोई ढूढंता रहा
अपने अंतर में
बस वही सवाल अमर है-
जिसका उत्तर न मेरे पास है
न जवाब सुनने की हिम्मत तुझमे हैं
इसलिए हवा के रूख के साथ मिटना सीख लो
क्योंकि मृत्यू ही अमर है... मृत्यू ही चिरस्थाई है ।
और...
उसके बाद बस एक सन्नाटा......
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