उसके लिए
नहीं जान पाओगी कभी तुम
इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद भी
जुड़ रहा है कई दिनों से
तुम्हारे जीवन से कोई अदृश्य तरीके से।।
करती दोस्तों के साथ रोचक वार्तालाप
या बैठी-खड़ी होती हो स्टाप पर
देखता है कोई तुम्हें
एक ढहते हुए दिल को
अपनी हथेलियों में थामें।।
चला रहा है कई दिनों से यह सिलसिला
नहीं आता है मुझे बोलना
साफ-साफ अपने मन को
सचमुच
नहीं जान पाओगी कभी तुम
इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद भी
जब गा रही होती हो कोई गीत
थिरक रहे होते हैं तुम्हारे पैर
नाचता है कोई तुम्हारे साथ
बनाते हुए बमुश्किल तुम्हारे नृत्य से
अपना संतुलन, दिल ही दिल में ।।
जुड़ा है जो तुम्हारे जीवन से अदृश्य तरीके से
मुंह से तो कुछ कहता नहीं
पत्र भी नहीं लगता
पता भी नहीं चलेगा कभी तुम्हें
जब जल रही थी जलन से तुम्हारी देह
बीन रहा था कोई दबे पांव
तुम्हारी सांसों से बीमारियों के कीटाणू
मांग लिया था खुदा से तुम्हारा रोग
स्वयं के लिए
और पीता रहा था हथेलियों में से देर तक
तुम्हारी बीमारियों के कीटाणू ।।
न जाने किस्मत भी कैसी है मेरी
कि लड़ना पड़ता है आखिरी दम तक
हर चीज के लिए, और
दम टूटने से पहले ये फैसला आता है कि
हमारी ही हुई हार है
कई बार किस्मत बी हारा है
पर इतना भी नहीं कि मुझे याद हो...
परन्तु क्या ?
समझ पाओगी मरी व्यथा
क्या जान पाओगी कभी तुम
मैं ऐसा क्यों हूं
पर क्या करूं, सहना तो मुझे ही है
अगर अपने लिए व्यथा लिखी है तो
पढ़ना भी तो हमे ही है...
इसलिए तो कहता हूं
नहीं जान पाओगी कभी तुम
इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद भी
जुड़ चुका है कई दिनों पहले
तुम्हारे जीवन से कोई अदृश्य तरीके से।।
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