चांद,
उज्जवल छांव लिए
मनभावन शीतल रूप लिए
बादल के पार बुलाते हैं
धरती पर बैठे बेचारे से
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
एक पुरातन शिलालेख पर
उभरी हुई सी एक आकृति
आंखों में उसके आमंत्रण है
चेहरे पर कटु भाव लिए
पास बुलाती भरमाती है
पर उसके घर से शिलाखंड वो
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
निर्दयी, कुटील पड़ोसी के घर
आलमीरें में एक किताब पड़ी है
जिल्द उसकी फटी हुई है
और, उसके समझ से बाहर
फिर भी उसके चित्र उसे
जाने-पहचाने से लगते हैं
उन चित्रों से उसका नाता
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
बारिश की हर बुंद-बुंद का
अपना-अपना जीवन है
कुछ तपती मरू में गिरकर
भाप बन उड़ जाते हैं
कुछ फुलों के परों पर गिरकर
सृष्टि नई रचाते हैं
और, कुछ पानी से मिलकर
बुलबुले खिलाते हैं
इन बुलबुलों के सतरंगी सपने
पूरे होने में वक्त अभी
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
दूर भैरवी बज रही थी
सपने में कुछ-कुछ देखा उसने
देखा क्या ? महसूसा उसने
आत्मतृप्ति का पल था वो
पर सपने की ताबीर अभी
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
दिल से निकले
इन शब्दों को
पढ़ने वाले
पढ़कर और समझने वाले
दूर, बहुत, बहुत दूर अभी है।।
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