तुम मुझे मिली
तमाम निराशा के बीच
तुम मुझे मिली
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए
आंसू की तरह।
शहर में जब प्रेम का अकाल पड़ा था
और, भाषा में नहीं रह गया था
उत्साह का जल
तुम मुझे मिली
ओस में भीगी हुई, दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह।।
इतनी धूप थी
कि पेड़ों की छांव को
अप्रासंगिक बनाते हुए
इतनी चौंधी कि स्वपन के ताबीर को
छितराते हुए
तुम मुझे मिली
थकान में उतरी हुई
नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह ।।
जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहां होना है
जब मैं तुम्हें खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
चुपचाप शांत उषा की लालिमा में
तुम मुझे मिली
विरान रास्ते पर
मित्र की तरह
मित्रता की सरहद पर
प्रेम की तरह ।।
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