गुरुवार, 2 सितंबर 2010

कहीं पहले से...

पिछले कई दिनों से बिस्तर पर आंखे बंद करने से डरने लगा हूं... नींद से आंखे बेझिल होने लगती है... फिर भी आंखे बंद करने से डरता हूं.... अभी भी रात के बारह बजकर ग्यारह मिनट होने वाला है और मैं सोने के बदले कागद गीले कर रहा हूं.... .नहीं जानता ऐसा क्यों कर रहा हूं.... बस ऐसा लगता है कि आंखे बंद करते ही सब खत्म हो जाएगा...ये दुनिया, ये तारीख सब बदल जाएगी।

कभी कभी लगता है कि ये पागलपन की शुरूआती लक्षण है... एक अकेला तन्हा इंसान और क्या-क्या सोच सकता है मैं नहीं जानता... मैं ये भी नहीं जानता कि लोग खुश कैसे रहते हैं.... और सच कहता हूं मैं बिल्कुल भी ये नहीं जानता कि मैं किस से भागता फिरता हूं.... और वो कौन है जिससे मैं डरकर यहां-वहां भागता फिरता हूं....।

लोग कहेंगे कि मेरा बीता हुआ कल इतना भयावह है शायद यही वजह है कि मैं भागता फिरता हूं.. लेकिन ये सिर्फ मैं जानता हूं कि बचपन से शायद चार या पांच साल की उम्र से जब से मुझे लगा कि मैं सोचने लगा हूं...समझने लगा हूं....उसी वक्त से अपने आप से डर कर भाग रहा हूं....।

भागने से मेरा मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि दिल्ली से हैदराबाद से भागलपुर से या फिर कहीं और से भाग रहा हूं...मेरी स्थिति कुछ-कुछ कस्तुरी मृग जैसी है......जिसके नाभी में कस्तुरी होती है और जिंदगी भर वो उस कस्तुरी की खोज में भटकता फिरता है.....लगता है मेरे अंदर भी गम का कोई कीड़ा जड़ जमाए बैठा है जो मुझे आजाद नहीं होने देता।

लोग गमजदा तब होते हैं जब उसके पास कुछ नहीं होता... मेरे पास तो सबकुछ है..अच्छा परिवार अच्छे दोस्त औऱ जेब में भी इतने सिक्के तो जरूर हैं कि फाइव स्टार न सही उमेश की चाय दुकान से कभी भी एक कप चाय की प्याली खरीद लू....मैराथन जीतने की ताकत न सही लेकिन मेरे हौसले इतने मजबूत जरूर हैं कि मैं पत्थर को भी पानी कर दूं....फिर भी क्यों मैं गमजदा हूं नहीं जानता....।
क्या हूं मैं ? इस सवाल से मेरा कोई लेना देना नहीं.... दर्शनशास्त्र की उलझी गुफाओं से रास्ता ढुंढ़ निकालने का भी मेरा कोई मकसद नहीं....धर्म और ईश्वर से मैं दूर हूं....पाप पुण्य की परिभाषा भी मैंने अपने हिसाब से गढ़ रखी है.... मेरी जिंदगी का हर फैसला मेरी मर्जी से हुआ है... अपनी दुखती रग के लिए भी मैं ही जिम्मेदार हूं.... हां, इतना जरूर है कि मुझमें अभी इतनी हिम्मत नहीं है कि उस सच को जगजाहिर कर सकूं.... और भी कई सच हैं जो मैं जानता हूं... और ये भी मानता हूं कि उस सच की वजह से मुझे आंखें बंद करने से डर लगता है.... सड़क हादसे से ठीक पहले की रात की बात हो या पटेल चौक की बात...... सिर्फ और सिर्फ सच मैं जानता हूं....और ये जानता हूं कि मुझे आंखे बंद करने से क्यों डर लगता है......।

ये सत्य है कि मैं जानता हूं..... लेकिन ये उससे भी बड़ा सत्य ये है कि मैं नहीं जानता.... क्योंकि 12 जुन उन्नीस सौ सत्तानवें की रात और 16 मई दो हजार छह के बाद से ही मैं डरा हुआ नहीं हूं....मैं तो इस तारीख से कहीं पहले जन्म के कुछ साल बाद से ही डरने लगा था.... आंखे बंद करने से....आईना देखने से.... खेलने से.... पढ़ने से.... बात करने से.... खुद को परखने से... खुद को साबित करने से... झूठ बोलने से..... प्यार जताने से.... मोहब्बत करने से......।

........................... हां मुझे डर लगता है...बिस्तर पर जाने से....अकेले होने से... मैं नहीं चाहता कि एक पल के लिए मेरा सामना खुद से हो और मैं खुद से बात कर स

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