कुछ लिखने से डरता हूं
कहीं वो ये न समझ ले
कि सफे पर उकरा हुआ
हर पवित्र शब्द उसको दुआएं देता है ।
उसके सामने कुछ कहने से डरता हूं
शब्दों को तौल-तौल कर हवा में बिखेरता हूं
डरता हूं कि कहीं शब्दों की खुशबू से
उसे मेरे होने का एहसास न हो जाए।
सपनों में भी उसे छूते हुए डरता हूं
उसके बिखरे हुए जुल्फों को देखकर
जरा संवारने को दिल करता है
उसकी हिरणी सी चंचल आंखें हमेशा कहती है
कि आ मुझे भी छेड़ ले जरा
उसके चेहरे का हाव भाव हर वक्त निमंत्रण देता है
वो पास बुलाती है
पर जाने से मैं डरता हूं ।
सोचता हूं दिल ही निकाल कर रख दूं
किसी दिन उसके सामने हथेली पर
पर फिर ये सोच कर डर जाता हूं
कहीं हथेली पर तड़पते हुए मेरे दिल में
उसे उसकी सूरत न दिख जाए....
इसलिए दिल निकालने से भी डरता हूं।
मैं जानता हूं कि सब मेरा है
मेरी हर भावनाओं पर मेरा ही अधिकार है
रात को रात कहने का और दिन को दिन बनाने का
सिर्फ और सिर्फ मुझे अधिकार है
उसके होने “और” न होने का
फर्क करना भी मेरा ही काम है
फिर डरने की क्या जरूरत हैं
और मैं क्यों डरता हूं ?
… लेकिन, क्या करूं सब जान कर भी
सांस लेने भी से डरता हूं ।।
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