उन्नीस सौ सैंतालीस से लेकर अब तक झेलम और चेनाव में जितना पानी बहा है, उससे कहीं ज्यादा आंशू कश्मीरी आवाम के साथ-साथ पूरे हिन्दुस्तान के लोगों ने बहाया है...और एक बार फिर से लाल चौक इंसानी खून से लाल हो रहा है...।
सरदार पटेल ने जितने देशी रियासतों का हिंदुस्तान में विलय कराया.... उसमें से कहीं भी आज इस बात को लेकर कोई शंका कोई और हिचक नहीं है कि वो हिन्दुस्तान के साथ क्यों है... न ही उसमें से कोई भी प्रदेश डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रहा है... और न ही कहीं के नौजवान इस कदर अपने लहू से अपना वर्तमान और आने वाले भविष्य को अंधेरे में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन, कश्मीर में ये सब हो रहा है.... और पिछले छह दशक से लगातार घाटी में यही हो रहा है... संसद से लेकर सड़क तक हर कोई चिंतित है...शर्मसार है... बेबस है, कि कश्मीर में अमन चैन नहीं है...... कश्मीर मुद्दे को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई है... प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि कश्मीर समस्या की चाबी एक राजनीतिक समाधान है... अब सवाल ये उठता है कि प्रधानमंत्री किस राजनीतिक समाधान की बात करते हैं... और अगर भारत सरकार को लगता है कि कश्मीर का राजनीतिक समाधान निकाला जा सकता है तो फिर भारत सरकार पिछले छह दशक से सो क्यों रही थी... क्यों ये समाधान जिसकी बात मनमोहन सिंह कर रहे हैं पहले नहीं लागू किया गया...।
कश्मीर का भारत के साथ आना भारत के धर्मनिरपेक्ष राज्य की पुष्टि थी,... उन दिनों कश्मीर के सबसे बड़े नेता रहे शेख अब्दुल्ला भी मानते थे कि कश्मीर का भविष्य भारत के साथ सुरक्षित है....।
फिर ऐसा क्या हो गया कि कश्मीर जंग का मैदान बन गया.... शेख अब्दुल्ला से लेकर उमर अबदुल्ला तक और पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक किसी को कश्मीर में शांति का रास्ता नजर नहीं आय़ा... सवाल कई सारे हैं.... और उसका जवाब किसी के पास नहीं है... न तो भारत सरकार के पास ना कश्मीर में सत्ता में बैठे उमर अबदुल्ला के पास और न ही कश्मीर में आग भड़काने वाले पाकिस्तान के पास.... ।
आजादी के तीन दशक तक कश्मीरी आवाम शांति के सपने संजोती रही और ये सोच कर सोती रही कि यहां अमन होगा... और सब ठीक हो जाएगा... लेकिन कुछ ठीक नहीं हुआ... सन अस्सी के बाद कश्मीर के पुराने बाशिंदे राज्य छोड़कर भागने को मजबूर हुए... कश्मीर में एक नई बंदूक संस्कृति का उदय हुआ जिसे दिल्ली से वजह और इस्लामाबाद से मदद मिलती रही ....और ये वजह और मदद आज भी बदस्तूर जारी है।
अब सवाल ये उठता है कि अब हम क्या करें. क्या कश्मीर को हमेशा बंदूक के दम पर अपने पांवों के नीचे रखें ? अगर वह शांति से रहने को तैयार हो तो उसे रोटी और रोज़गार दें.... राहत और रियायत के नाम पर लाखों-करोड़ों की रिश्वत दें वरना उसके सीने में संगीन भोंकें ? या फिर उसे आज़ाद करके उसके हाल पर छोड़ दें ?
दरअसल कभी किसी ने यो सोचा ही नहीं कि कश्मीर क्या चाहता है... ये समझने की कभी किसी ने कोशिश ही नहीं कि कश्मीरी आवाम क्या चाहती हैं.... हिन्दुस्तान अपनी आन, बान, और शान के लिए उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता...पाकिस्तान अपनी खोखली जिद पड़ अड़ा हुआ है....और दोनो देशों के अहम के बीच कश्मीरी आवाम पिस रही है...।
दोनो मुल्को की वजह आज लाल चौक को लहू लुहान हो उठी है... रोको उस बहते हुए खून को...रोको उस बुलेट को जो उनके शरीर को भेदने को आतुर है... रोको उस जंग को जो इंसानियत को शर्मशार करती है... पूरी दुनिया के लोग कश्मीर को जन्नत कहते हैं लेकिन हर हिन्दुस्तानी ये अच्छी तरह से जानता है कि दिल के बहलाने के लिए जन्नत का ये ख्याल कितना अच्छा है।
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