मांफी मांगने को दिल करता है.... उन उम्मीद भरे चेहरों के लिए...उस झूठी आशा के लिए....आंखों में तैरने वाले उनके सपनों के लिए....छोटे-छोटे बच्चों के झूठे इंतजार के लिए.... संज संवर कर बैठी एहसान खान की पत्नी से.....अभय यादव के परिवार से.....रूपेश कुमार के पिता से....जो एक उम्मीद में पलक बिछाए पिछले कई घंटों से अपने लख्ते जिगर के इंतजार में बैठे हैं....।
जानता हूं, मैं भी उसी सिस्टम का एक हिस्सा हूं... जो उनकी आंखों में पसरे दहशत भरे सपने के लिए जिम्मेदार हैं....और, आज सवा चार साल की उम्र में पहली बार ऐसा लग रहा है कि मैंने अपने आत्मा के साथ गद्दारी की....... किसी की आंशूओं का व्यापार मैंने पहली बार नहीं किया था....लेकिन कभी मुझे उसपर अफसोस नहीं हुआ था.... क्योंकि हर बार मेरी उंगलियां खुशियों से भरे दमकते चेहरे या ऐसी उम्मीद के लिए की बोर्ड पर चली थी.......आज भी एक ऐसी ही उम्मीद में..... मैंने चंद शब्दों का व्यापार किया था....लेकिन कुछ ही मिनटों में शायद सौ से डेढ़ सौ मिनटों में ही मेरी उम्मीद की इमारत धाराशाई हो गई।
एक खबर टेलीविजन स्क्रीन पर दिखाई दे रही थी....एक खबर न्यूज़ रूम में सबके पास आ रही थी....और मेरे कंप्यूटर स्क्रीन पर भी एक खबर की आरिजनल फूटेज उभर रही थी... जिसे देखकर मेरे सोचेने समझने की शक्ति खत्म हो गई थी...मुझे समझ में नहीं आ रहा था...कि अगर न्यूज रूम में जिस खबर की चर्चा हो रही है..उस खबर को हम कैसे प्रसारित करेंगे....कैसे किसी को बताएंगे कि पिछले सोलह घंटों से जिस खबर पर हम चिल्ला रहे हैं.... जिस खबर को देखकर करोड़ो लोग राहत की सांस ले रहे हैं....वो गलत होने वाली है....।
मैं नहीं जानता कि पत्रकारिता धर्म क्या होता है....और यकीन मानिये आजतक इस शब्द से मैंने कोई रिश्ता भी नहीं जोड़ा.... फिर भी यकीन के साथ ये कह सकता हूं कि मेरी जगह कोई और होता तो वो वही करता...जो मैंने किया.... लेकिन मैं भीड़ नहीं हूं....और न ही मेरी आत्मा की अभी मौत हुई है... शायद यही वजह थी कि मैं जल्द से जल्द न्यूज रूम से भाग जाना चाहता था...मैं नहीं चाहता था...उस वक्त वहां मौजुद रहूं, जब वो बिजली गिराने वाली खबर चले.... मैं नहीं चाहता था...कि मैं एक भी शब्द लिखूं....मैं नहीं चाहता था....वहां रहूं.....।
बाहर धूप भी नहीं थी....और अंदर मैं कांप रहा था....समझ में नहीं आ रहा था....क्या करूं....कहां जाऊं...कैसे कहूं....चाय पीने बाहर आय़ा....थोड़ी बहुत चर्चा भी हुई....लेकिन अंदर जो तुफान था...वो मुझसे सहन नहीं हो रहा था....और पहली बार मैं न्यूज रूम से इस तरह बाहर निकल आया....बिना ये जाने की उस खबर का क्या हुआ....वो गलत है या जो हम दिखा रहे हैं वही सच है....काश हमारा व्यापार ही सही....इंसानियत के लिए शर्मसार करने वाली हमारी करतूत ही सही....सच हो जाए और हसरत भरे उन आंखों से निकलने वाले आंसू गम के आंशू में तब्दील न हो.... और मेरा ये विश्वास कि मैं अभी जीवित हूं....बरकरार रहे....आमीन।
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