सत्य और अहिंसा की भूमि बिहार.......भगवन बुद्द और महावीर की धरती बिहार.... चाणक्य की राजनीति और समुद्रगुप्त के विजयगाथा की साक्षी बिहार.... कुंवर सिंह के शौर्य और भिखारी ठाकुर के विदेशिया का देस बिहार आज मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में पूरी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को तैयार है....।
पिछले कई सौ सालों से जो बिहार गरीबी और पिछड़ेपन की गर्त में था, पलायन जहां की नीयती बन गई थी... आज वही बिहार विकास के नए आयाम छू रहा है...बदलाव की ये लहर दो हजार पांच में उस वक्त शुरू हुई थी जब यहां की जनता ने विकास पुरूष नीतीश कुमार के हाथों अपनी किस्मत सौप दी थी....।
कहते हैं हिन्दुस्तान में जब भी बदलाव की शुरूआत हुई बिहार से हुई.... दो हजार पांच का मौका पहला नहीं था जब इस धरती ने बदलाव देखा हो.... सवा दो हजार साल पहले से ही यहां की आबोहवा ने बदलते जमाने के साथ अपने को बदलना सीख लिया था...।
तीन सौ पच्चीस ई पूर्व की बात है, नंद वंश के धनानंद ने जब गरीब ब्राह्मण चाणक्य का अपमान किया तो चाणक्य ने अपनी बुद्दि कौशल से न केवल नंद वंश का अंत किया बल्कि उसकी जगह पर एक ऐसे वंश की स्थापना की जिसमें चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक जैसे महान शासक हुए।
चाणक्य की रणनीति और कूटनीति का लोहा पूरी दुनिया मानती है...सत्ता हासिल करने के खेल में आज भी लोग चाणक्य से प्रेरणा लेते हैं.... तात्कालीन राजनीति पर लिखी चाणक्य की अर्थशास्त्र आज भी इस विषय पर लिखी गई सर्वोच्च कृति है। चाणक्य को कई लोग कौटिल्य के नाम से भी जानते हैं।
राजनीति में बदलाव और छलकपट के खेल से दूर इस धरती पर सत्य और अहिसा के अंकुर भी फुटे... ये अंकुर बड़ा होकर ऐसे विशाल वृक्ष में परिणत हुआ जिसकी छाया ने पूरी मानवता को एक नया अर्थ दिया।
सभी का जन्म होता है और वक्त आने पर सबकी मृत्यू हो जाती है....ये दुनिया दुखों से भरी हुई है....दुख में आकंठ डूबे इंसान को दुखों से नीजात दिलाने के लिए के लिए कपिलवस्तू नेपाल से सिद्दार्थ गौतम ने बिहार की पतित पावन धरती पर कदम रखा.... कठोर तपस्या के बाद पैंतीस वर्ष की उम्र में सिद्दार्थ गौतम को नीरंजना नदी के तट पर एक पीपल पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई....और इसी घटना के बाद सिद्दार्थ गौतम... बुद्द हो गए।
बुद्द का मतलब है दी अवेकंड, यानि वो जो जाग गया- वह आदमी जो जाग गया....बुद्द ने कहा यह संसार दुखमय है। संसार का सबकुछ नश्वर है और पीड़ा से परीपुर्ण भी। जन्म भी दुख है, बुढ़ापा भी दुख है, मरण, शोक, रुदन, मन की खिन्नता, हैरानी सभी दुख है। अप्रिय से संयोग प्रिय से वियोग भी दुख है, इच्छा करके जिसकी प्राप्ति नहीं होती वह भी दुख है..... बुद्ध ने इन्ही दुखों से छुटकारा दिलाने के लिए आष्टांगिक मार्ग का ज्ञान दिया...।
सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक उद्योग, सम्यक विचार और सम्यक समाधि......इन आष्टांग मार्ग का सीधा सा मतलब है पवित्र हृदय, शुद्द विचार और कार्य, मन, वचन और कर्म से शुद्द एवं सात्विक जीवन व्यतीत करना.. इन्ही आष्टांगिक मार्ग पर चलकर जो सादा और सच्चा जीवन व्यतीत करता है, वही पुरूष महापूरूष है, धर्मात्मा है।
बुद्दं शरणम गच्छामी, संघम शरणम गच्छामी, धम्मम शरणम गच्छामी....बौद्ध धर्म का ये संदेश बिहार की धरती से निकलकर श्रीलंका, चीन, जापान, तिब्बत को सुगंधित करता रहा।
महात्मा बुद्द अकेले धर्म प्रवर्तक नहीं थे जिन्होंने यहां की धरती को सुशोभित किया.... पांच सौ निन्यानवें इसा पूर्व जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकंर महावीर ने भी यहां जैन धर्म के जरिए लोगों को सभी जीवों से प्यार करना सिखाया।
वर्धमान महावीर का जन्म वैशाली के बसोकुंड ग्राम में राजा सिद्दार्थ के घर हुआ था और उनकी माता का नाम प्रियकारिणी था... महावीर ने अपने युग के संशयग्रस्त मानव समाज को धर्म-आचरण की नवीन दिशा और ज्योति प्रदान की... उन्होंने धर्म के क्षेत्र में मंगल क्रांति संपन्न की।
महावीर ने उदघोष किया कि आंख मूंदकर किसी का अनुकरण या अनुसरण मत करो। धर्म दिखावा नहीं है, रूढ़ी नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, किसी के प्रति घृणा और द्वेषभाव भी नहीं है..... उन्होने कहा धर्म उत्कृष्ठ मंगल है, धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान है जिससे आत्मा का शुद्दिकरण होता है....धर्म न कहीं गांव में होता है और न कहीं जंगल में बल्कि वह तो अन्तरात्मा में होता है। उन्होने कहा कि जीवात्मा ही ब्रह्म है इसलिए प्राणि मात्र का कल्याण हो।
जब पूरी दुनिया आज आतंकवाद के आग में जल रही है... अलगाववाद और नक्सलवाद जब इंसान और इंसान के फर्क को लहूलुहान कर रही है... ऐसे में महावीर और महात्मा बुद्द के विचार इस संसार में शांति और अमन कायम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
धर्म के साथ-साथ इस धरती से ज्ञान और विज्ञान का प्रकाश भी पूरी दुनिया में फैला....आर्यभट्ट ने शुन्य की खोज की जिसकी बदौलत आज चांद और मंगल की दूरी तय करने में दुनिया कामयाब हुई.पतंजलि...गार्गी...मैत्रेयी....कणाद...बुद्दघोष...और विष्वामित्र जैसे विद्दानों की वजह से पूरी दुनिया यहां की विद्दता का लोहा मानने को मजबूर हुई...। वैशाली के जरिए लोकतंत्र का प्रकाश भी यहीं से फैला....इस जहान में कौन ऐसा व्यक्ति होगा...जो वैशाली की नगरवधू आम्रपाली से अपरिचित हो....।
मगध औऱ पाटलिपुत्र के जरिए पूरे हिन्दुस्तान की धरती को एकसूत्र में यहीं से पिरोया गया...चंद्रगुप्त मोर्य, समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य, अशोक, बिन्दुसार, बिम्बिसार जैसे राजा इसी धरती पर पैदा हुए...।
इस धरती का इतिहास इतना गौरवमयी है और यहां इतने महान-महान व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव हुआ है कि गिनती करना असंभव हो जाएगा.... इस धरती को जब विदेशी आताताइयों की नजर लगी और हिन्दुस्तान की सत्ता पाटलीपुत्र से दिल्ली चली गई तब कुछ सालों के लिए बिहार की रौशनी मंद जरूर हुई.... लेकिन यहां की मिट्टी इतनी कमजोर नहीं थी कि कोई भी इसे आसानी से रौंद जाता।
बाबर ने बड़े जोड़ से हिन्दुस्तान में मुगलिया सल्तनत की नींव डाली थी....लेकिन उसके पुत्र हिमायुं को शेरशाह सुरी ने चौसा के युद्द में पराजित कर ये दिखा दिया की इस धरती पर चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त जैसे वीरों की कोई कमी नहीं है।
मुगलिया सल्तनत के खात्मे के बाद ब्रिटिश हुकमत को भी यहां भारी विरोध का सामना करना पड़ा.... आरा के वीर कुंवर सिंह को कौन भूल सकता है... जिन्होंने अस्सी साल की उम्र में अंग्रेजो को पानी पिला दिया था... खुदीराम बोस, पीर अली, रासबिहारी लाल मंडल, गिरधरधारी चौधरी, योगेंद्र शुक्ल, बटुकेश्वर दत, बैंकुठ शुक्ल, बसावन सिंह जैसे स्वतंत्रता सैनानियों की वीरगाथा आज भी यहां की माएं अपने बच्चों को पालने में सुनाया करती है...।
महात्मा गांधी जब साउथ अफ्रिका से लौटकर वापिस आए तो उन्होने अपने आंदोलन की शुरूआत इसी मंगल भूमि से की...चंपारण में नील की खेती के खिलाफ शुरू हुई उनकी लड़ाई तब तक जारी रही जबतक की अंग्रेज इस धरती को छोड़कर सात समंदर पार नहीं चले गए।
स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार में एक से एक कांग्रेसी नेता महात्मा गांधी का साथ देने के लिए एकजुट होकर खड़े हो गए.... फिर चाहे वो बाबू राजेंद्र प्रसाद हो या फिर सच्चिदानंद सिन्हा..... हर किसी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अपनी अहम भूमिका निभाई..... उन्नीस सौ बयालीस में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पटना में शहीद हुए सातो जवान अमर हो गए और उनकी शौर्यगाथा इतिहास के पन्नों पर स्वर्णअक्षरों में दर्ज हो गई...।
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।।
........................................................ जब इस देश की जनता जाग उठी तब अंग्रेजों का भारत की सत्ता छोड़नी पड़ी।
गांधी जी के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले सादगी पसंद राजेंद्र बाबू स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने.... भारतीय संविधान सभा की जब पहली बैठक नौ दिसम्बर उन्नीस सौ छियालीस को नई दिल्ली में आयोजित हुई तब इसकी अध्यक्षता भी बिहार के ही डा० सचिचदानन्द सिन्हा ने किया था।
आजादी के बाद अनुग्रह नारायण श्री कृष्ण सिन्हा ने पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया....लोकतांत्रिक सरकार के गठन के साथ ही बिहार की विकास गाथा शुरू हो गई...झारखंड की अकूत खनिज संपदा से परिपूर्ण इस प्रदेश में आजादी के पहले दशक में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी शुरू हुई...।
लेकिन उन्नीस सौ बहत्तर आते-आते बिहार की विकास गति मंद पड़ने लगी.... साथ ही उसी देश में इमरजेंसी लगा दी गई..... देशभर के साथ-साथ बिहार के भी कई नेता जेल में बंद कर दिए गए.... आजादी के बाद ये पहला मौका था जब इस देश में लोकतंत्र से खिलवाड़ किया गया...।
जब लोकतंत्र को ताक पर रख दिया गया था तो ये कैसे संभव हो सकता था कि बिहार की महान क्रांति भूमी चुपचाप सब देखती जाए..... जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इमरजेंसी के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन जल्द ही पूरे देश में फैल गया....आजाद भारत में जेपी के आंदोलन से बड़ा आंदोलन इस देश ने आज तक नहीं देखा.....जेपी के आंदोलन की ही धमक थी कि कुछ ही महीने में इमरजेंसी की हवा निकल गई।
इमरेजेंसी तो खत्म हो गई लेकिन बिहार में जो अंधेरा फैलने लगा था वो और स्याह होने लगा था.... धरतीपुत्र कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव ने जब प्रदेश की गद्दी संभाली तो ऐसा लगा कि यहां पिछड़ों का विकास होगा और पीड़ितों को न्याय मिलेगा.....लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसका लोगों ने सपना देखा हो....।
फिर आया दो हजार पांच का साल.....फरवरी दो हजार पांच के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला....लिहाजा विधानसभा का गठन तक नहीं हो पाया....लिहाजा चुनाव आयोग ने दोबारा चुनाव कराने की घोषणा कर दी.....चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने लोगों को विकास और न्याय का सपना दिखाया और उन्हें ये भरोसा दिलाया कि वो बिहार की सत्ता उनके हाथ सौंप कर निश्चिंत हो जाए.....ऐसा हुआ भी और दिनकर की कविता साकार हो उठी।
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।।
दो हजार पांच का चुनाव कोई ऐसा वैसा चुनाव नहीं था ये चुनाव था पिछड़ेपन बनाम विकास का....ये चुनाव था अन्याय बनाम न्याय का.... नीतीश कुमार ने जनता को जो भरोसा दिया था वो अब हकीकत में नजर आने लगा......।
अपराधी जेल की सीखचों के पीछे थे....बेहाल सड़क और बदहाल अस्पताल बीते दिनों की बात हो गई....कुछ दिनों पहले तक जहां राजधानी की सड़कों पर लड़कियों का निकलना दूभर हो गया था वहीं अब गांव घरों की लड़कियों के सपनों को भी पर लग गये हैं.... नीतीश कुमार के बिहार में घर से निकलकर लड़कियां अब स्कूल जाने लगी हैं....जो बच्चे मुट्ठीभर अनाज के लिए मजदूरी करने को मजबूर थे उन्हीं बच्चों का भविष्य अब मिड डे मिल योजना की वजह से उज्जवल होने लगा।
विकास और न्याय का जो सपना नीतीश कुमार ने लोगों को दिखाया था वो साकार होने लगा था...... सबकुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था कि एकबार फिर चुनाव का मौसम आ गया.... नीतीश कुमार ने यहां की लोगों के लिए जो कुछ किया वही जनता ने उन्हें वापस कर दिया....... बिहार विधानसभा के जब नतीजे आए तो सभी चुनावी पंडितों के गणित धरे के धरे रह गए और नीतीश कुमार को ऐतिहासिक जनादेश मिला।
नीतीश कुमार के नेतृत्व में आज बिहार विकास के पथ पर अग्रसर है....यहां की आठ करोड़ से ज्यादा जनता को भरोसा है कि ये विकास पुरूष उनके हर सपने को साकार करेगा....और बिहार को अपराधमुक्त बनाकर, शांति के साथ विकास के उस पायदान पर लेकर जाएगा जिसका वो हकदार है।
कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम ले
क्राँति को सफल बना
नसीब का न नाम ले
न्याय हो तो आर-पार एक ही लकीर हो
चाँदनी लिए चला तो घूम हर मुकाम ले
त्याग का न दाम ले
दे बदल नसीब तो ग़रीब का सलाम ले
ग़रीब का सलाम ले।।
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