शब्दों के खेल में
तुम्हें जो जीत लेता मैं
सच मानो तो
वो जीत-जीत नहीं होती
वो हार सबसे बड़ी होती ।।
अपनी जीत का करता क्या मैं
जब तुम, मेरी हो गई होती।
शायद तब जीवन व्यर्थ हो जाता
जब पाने की ललक ही मर जाती ।।
एक उत्साह
एक उल्लास
एक नींद और एक सपना
सब देखा, सब पर सोचा
जितना अबतक समझ पाया हूं
उतना भर कहता हूं मैं
जीवन तब तक जीवन है
जब तक उसमें खालीपन है,
अकेलापन, आवारापन
सब के सब जब तक अंतर में है।।
निकल गया जो अंतर से तेरे
फूट जाएंगे सब गुब्बारे
फिर अरमानों की निकलेगी अर्थी
और, उत्साह मरसिया गाएंगे।
ये जीवन का सार तत्व है
चाह बहुत तू, पर पाने की
इच्छा इतनी अदम्य न रख
दुख पाएगा, दुख पाएगा
इतना आंसू तू रोएगा
डूब जाएगा खुद तू उसमें
अपने अंदर खालीपन रख
इतना रख की-हर सुख छोटा पड़ जाए
और, दुख कोने में पड़ा रहे....।
तुम्हें जो जीत लेता मैं
सच मानो तो
वो जीत-जीत नहीं होती
वो हार सबसे बड़ी होती ।।
अपनी जीत का करता क्या मैं
जब तुम, मेरी हो गई होती।
शायद तब जीवन व्यर्थ हो जाता
जब पाने की ललक ही मर जाती ।।
एक उत्साह
एक उल्लास
एक नींद और एक सपना
सब देखा, सब पर सोचा
जितना अबतक समझ पाया हूं
उतना भर कहता हूं मैं
जीवन तब तक जीवन है
जब तक उसमें खालीपन है,
अकेलापन, आवारापन
सब के सब जब तक अंतर में है।।
निकल गया जो अंतर से तेरे
फूट जाएंगे सब गुब्बारे
फिर अरमानों की निकलेगी अर्थी
और, उत्साह मरसिया गाएंगे।
ये जीवन का सार तत्व है
चाह बहुत तू, पर पाने की
इच्छा इतनी अदम्य न रख
दुख पाएगा, दुख पाएगा
इतना आंसू तू रोएगा
डूब जाएगा खुद तू उसमें
अपने अंदर खालीपन रख
इतना रख की-हर सुख छोटा पड़ जाए
और, दुख कोने में पड़ा रहे....।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें