रोती हुई आंखों में
आज भी जिंदा है
कुछ ख्वाहिशें, कुछ बंदिशें
और, वक्त के कुछ फैसले।
जमींदोज़ नहीं हुए हैं
आज भी
यादों के कुछ सिलसिले!
वो मुस्कुराहट, वो खिलखिलाहट
कॉलेज कैंटीन, चाय और समोसे !
पेड़ की छांव
झुठमुठ की बैठकें
और, बेकार के इंकलाबी नारे
ब्लैकबोर्ड, डेस्क
संग थियेटर की दीवार
और, जिस-जिस जगह का
मैंने और तुमने साथ मिलकर
स्पर्श किया है
सब जिंदा हैं
आज भी
रोती हुई आंखों में।
वो कहते हैं कि भूल जाओ
यादों का क्या है
आंसुओं के संग बह निकलेंगे
लेकिन वो नहीं जानते
यादें आंसु नहीं है
वो तो आंसूओं का सबब है
जिसके होने से आंसू हैं
और, नहीं होने से
सब “शुन्य”।
यादें हैं, तो मेरे होने का मतलब है
अन्यथा वक्त के सफे पर
दो शब्दों की भी मेरी औकाद नहीं
सब जिंदा है
मेरी “औकाद” और वो “वक्त” भी
रोती हुई आंखों में
आज भी जिंदा है
कुछ ख्वाहिशें, कुछ बंदिशें
और, वक्त के कुछ फैसले।।
आज भी जिंदा है
कुछ ख्वाहिशें, कुछ बंदिशें
और, वक्त के कुछ फैसले।
जमींदोज़ नहीं हुए हैं
आज भी
यादों के कुछ सिलसिले!
वो मुस्कुराहट, वो खिलखिलाहट
कॉलेज कैंटीन, चाय और समोसे !
पेड़ की छांव
झुठमुठ की बैठकें
और, बेकार के इंकलाबी नारे
ब्लैकबोर्ड, डेस्क
संग थियेटर की दीवार
और, जिस-जिस जगह का
मैंने और तुमने साथ मिलकर
स्पर्श किया है
सब जिंदा हैं
आज भी
रोती हुई आंखों में।
वो कहते हैं कि भूल जाओ
यादों का क्या है
आंसुओं के संग बह निकलेंगे
लेकिन वो नहीं जानते
यादें आंसु नहीं है
वो तो आंसूओं का सबब है
जिसके होने से आंसू हैं
और, नहीं होने से
सब “शुन्य”।
यादें हैं, तो मेरे होने का मतलब है
अन्यथा वक्त के सफे पर
दो शब्दों की भी मेरी औकाद नहीं
सब जिंदा है
मेरी “औकाद” और वो “वक्त” भी
रोती हुई आंखों में
आज भी जिंदा है
कुछ ख्वाहिशें, कुछ बंदिशें
और, वक्त के कुछ फैसले।।

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