महान संगीतकार उस्ताद अलाउद्दीन खान का जन्म अठारह सौ इक्यासी में शिवपुर गांव में हुआ था....देश की आजादी के बाद शिवपुर गांव पूर्बी पाकिस्तान यानि की बांग्लादेश में चला गया....उस्ताद अलाउद्दीन खान के पिता का नाम हुसैन खान था...जिसे लोग साधू खान के नाम से जानते थे....। महान उस्ताद अलाउद्दीन खान साहब ने बचपन में संगीत सीखने के दौरान अपने गुरू से खूब मार खाई थी.... उनके गुरू अपने बेटे को सीखाने में लगे रहते थे...लेकिन संगीत सीखने का असल माद्दा तो अलाउद्दीन खान के पास था..।
भारतीय संगीत के सबसे बड़े घरानों में से एक मैहर घराने की नींव उस्ताद अलाउद्दीन खान ने ही रखी थी...इस घराने का का नाम मैहर राज्य की वजह से पड़ा जहां उस्ताद अलाउद्दीन खान की जिंदगीका ज्यादातर वक्त बीता था...... वे अज़ीम उस्ताद वज़ीर खान के शागिर्द थे.... वज़ीर खान सेनिया घराने की एक शाखा के वंशज थे, जिसका उदगम मियां तानसेन की पुत्री की ओर से हुआ था.....।
उस्ताद अलाउद्दीन खान ने ध्रुपद अंग पर आधारित अपनी स्वयं की शैली विकसित की जिसमें उपसंहार झाला समेत अलाप के विभिन्न चरणों का विस्तृत निष्पादन होता था.... उस्ताद अलाउद्दीन खान ने धुन के पद्यात्मक पाठ की भी शुरूआत की जो संपूर्ण राग के निष्पादन पश्चात प्रस्तुत होता था। इस शैली को उस्ताद अली अकसर खान, पंडित रविशंकर. श्रीमती अन्नपूर्णा जी और श्री निखिल बैनर्जी ने और भी विकसित किया...इतना ही नहीं उस्ताद अलाउद्दीन खान ने सा से प्रारंभ होने वाली द्रुत गतों की एक विशिष्ट संरचना भी की।
उस्ताद अलाउद्दीन खान दरबारी संगीतकार होने के बावजूद आमजनों में संगीत को लोकप्रिय बनाने का जतन करते रहते। उन्होंने मैहर के आमोखास को संगीत की शिक्षा दी। कइयों के वाद्य बजाने सिखाए। इसी दौरान मैहर बैंड की अवधारणा पनपी। उन्होंने कुछ लोगों को विविध वाद्ययंत्र बजाना सिखाना शुरु किया। इन वाद्ययंत्रों में कई तो उन्होंने ही बनाए थे। सितार और सरोद के मेल से बैंजो सितार, बंदूक की नलियों से नलतरंग, उनकी मौलिक रचनाओं में शामिल हैं। 90 साल पुराने मैहर बैंड को अब 'वाद्य-वृंद' के रूप में जाना जाता है... वाद्य-वृंद में हारमोनियम, वायलिन, सितार, तबला, नलतरंग, इसराज जैसे वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं।
उस्ताद अली अकबर ख़ान भारत में शास्त्रीय संगीत परंपरा के पितामह कहे जाने वाले बाबा अलाउद्दीन ख़ान साहेब के बेटे हैं....उन्हीं के संरक्षण में मैहर घराने की विरासत संभालते हुए अली अकबर ख़ान ने अपने पिता से संगीत सीखा. यह वो दौर था जब बाबा अलाउद्दीन खां साहेब के पास रविशंकर और अल्लारखा ख़ान जैसे लोग भी थे....अली अकबर खान इन लोगों के साथ संगीत और साज संभालते हुए बड़े हुए और फिर संगीत को देश के बाहर पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार करने का काम किया… अली अकबर ख़ान, पंडित रविशंकर और अल्लारखा ख़ान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत का मान विदेशों में उस वक़्त बढ़ाया जब भारतीय संगीत के बारे में पश्चिम को कम ही जानकारी थी.....बाबा अलाउद्दीन ख़ान साहेब कई साजों और गायन के माहिर थे पर अली अकबर ख़ान साहेब ने उनसे सरोद और गायन की शिक्षा ली और इसी में अपना मकाम हासिल किया. ....
विश्वविख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर प्रारंभ के दिनों में एक नर्तक के रूप में विख्यात थे... तब वह रवींद्र शंकर के नाम से जाने जाते थे... आपमें से ज्यादातर लोग शायद ही ये जनते होंगे कि सितार और सुरबहार की बारीकियां और तकनीकियों में दक्षता पंडित रविशंकर ने अफने गुरू बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खान से हासिल की थी।
एक बार की बात है उस्ताद अलाउद्दीन खान अपनी पत्नी मदीना बेगम के नाम पर एक नया राग रचने बैठे.....लेकन उन्हें उस राग का नाम ही समझ में नहीं आ रहा था....काफी सोच विचार करने के बाद उन्होंने जिस राग की रचना की उसे आज संगीत के जानकार मदनमंजरी राग के नाम से जानते हैं।
मशहूर फिल्मकार संजय काक ने उस्ताद अलाउद्दीन खान पर केन्द्रित एक डाक्यूमेंट्री का भी निर्माण किया था... गाड़ी लोहरदगा मेल नाम की इस डॉक्यूमेंट्री को जिसने भी देखा वो उस्ताद अलाउद्दीन खान के मुरीद होकर रह गए। उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत के बहुत बडे विद्वान थे.... संगीत सीखने और उससे संबंधित विचार-विमर्श करने के लिए लोग उनके पास बहुत दूर-दूर से आया करते थे। उनमें अमीर भी होते थे और गरीब भी....वह सभी को समान भाव से संगीत की शिक्षा दिया करते थे।
भारतीय शास्त्रीय संगीत अपने वास्तविक स्वरूप में जीवीत रहे...और वक्त के साथ इसका विकास होते रहे इसके लिए उस्ताद अलाउद्दीन खान ने मैहर कॉलेज ऑफ म्यूजिक की स्थापना की..... उस्ताद अलाउद्दीन खान को उन्नीस सौ बावन में संगीत नाटक अकादमी की ओर से पुरस्कृत किया गया था... इथना ही नहीं भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सुशोभित किया...।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें