बुधवार, 6 अप्रैल 2011

सम्मोहन !


सम्मोहन !
घेरते हैं...
दूर भागने की कोशिश
दम तोड़ती है हर बार।

सम्मोहन पत्थरों का
माफिक-ए-मोम है 
सर फूटने के बाद भी
आरोपित खास है।

गम नहीं है किसी को
सम्मोहन की मार का
चलत फिरते यूं ही अब
आदत सी हो गई है।

धूप से बचने के लिए
चाहिए, मुट्ठी भर छांव
इमारतों की चाह में
ठूंठ भर रह गए हैं दरख्त।

दमकते चेहरे और चमकते मौके
तलाशते हैं शहर-दर-शहर
लोग खुद-ब-खुद
बनने को हो जाते हैं आतुर
सम्मोहन का शिकार।

समझदारी धूल फांकती है
और, एहसासों को लगता है बट्टा
सम्मोहन के आगे विश्वामित्र तक
हो जाते हैं बेपर्दा,
कोई नहीं बच पाया
सम्मोहन की मार से
आम्रपाली के द्वार तक
बुद्द चले गए...।


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