बुधवार, 6 अप्रैल 2011

मोहब्बत में हिसाबी

मोहब्बत में हिसाबी हो गई हो तुम
करीने से सजी चीजों की आदि हो गई हो तुम ।
सादगी छोड़, रंगों की दुनिया में
बसर करना अब आदत तुम्हारी है...।।

जिन शब्दों को रद्दी समझ कर
कबाड़ी को तुमने बेचा है,
रात-रात लहू जलाकर
तेरे लिए वो मैंने लिखे हैं।

राह तुमने चुनी है जो
बेशक वो हंसी होगी
लेकिन, मेरी आहों का क्या ?
जो तेरे होने की गवाही है।

गुजरेंगे वहां से जब भी हम अकेले में
कोई खुशबू हमारे दिल में उतरेगी
करोगी, फिर बताओ क्या ?
या, आंखें मुंद लोगी तुम।


कहीं भी जम मिलोगी तुम
मुझे यूं ही तनहा पाओगी
साथ उसके भी होकर क्या ?
कह सकोगी, मैं भी ‘तनहा’ हूं।

जिंदगी नहीं है कोई हिसाब
जिसमें जोड़-तोड़ संभव हो !
दिलों का फेर भर है ये
समझ लो तो अच्छा है...
वरना
जिसे तुम हो समझती अपना
क्या पता वो पराया हो...।

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