शनिवार, 23 अप्रैल 2011

सपने (पाश की कविता)

सपने
हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोई आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई
हथेली के पसीने को सपने नहीं आते
शेल्फों में पड़े
इतिहास ग्रंथों को सपने नहीं आते

सपनों के लिए लाजिमी है
झेलने वाले दिलों का होना
सपनों के लिए
नींद की नजर होनी लाजिमी है

सपने इसलिए
हर किसी को नहीं आते।

( ये कविता पाश की है, जो लोग पाश को नहीं जानते....उन्हें शायद सपनों का सही मतलब नहीं मालूम.... और अगर सपनों का मतलब नहीं मालूम तो खतरनाक है उनके सपनों का मर जाना) 

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