शनिवार, 23 अप्रैल 2011

मैं अब विदा लेता हूं

मैं अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं

उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से चूती ओस
और बाल्टी में चोए दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सबकुछ का जिक्र होना था

उस कविता में मेरे हातों की सख्ती को मुस्कराना था
मेरी जांघों की मछिलों ने तैरना था
और, मेरी छाती के बालों की नरम शाल में से
स्निग्धता की लपटें उठनी थीं
उस कविता में
तेरे लिए
मेरे लिए
और जिंदगी के सभी रिश्तों के लिए बहुत कुछ होना था मेरी दोस्त
लेकिन बहुत बेस्वाद है
दुनिया के इस उलझे हुए नक्शे से निपटना
और यदि में लिख भी लेता
शगनों से भरी वह कविता
तो उसे वैसे ही दम तोड़ देना था
तुम्हें और मुझे छाती पर बिलखते छोड़कर
मेरी दोस्त, कविता बहुत ही निहसत्व हो गई है
जबकि हथियारों के नाखून बुरी तरह बढ़ आए हैं
और अब हर तरह की कविता से पहले
हथियारं से युद्द करना जरूरी हो गया है

युद्द में
हर चीज को बहुत आसानी से समझ लिया जाता है
अपना या दुश्मन का नाम लिखने की तरह
और इस स्थिति में
मेरे चुंबन के लिए बढ़े होंठों की गोलाई को
धरती के आकार की उपमा देना
या तेरी कमर के लहरने की
समुद्र के सांस लेने के तुलना करना
बड़ा मजाक सा लगना था
सो मैंने ऐसा कुछ नहीं किया
तुम्हें
मेरे आंगन में मेरा बच्चा खिला सकने की तुम्हारी खाहिश को
और युद्द के समूचेपन को
एक ही कतार में खड़ा करना मेरे लिए संभव नहीं हुआ
और अब मैं विदा लेता हूं

मेरी दोस्त, हम याद रखेंगे
कि दिन में लोहार की भठ्ठी की तरह तपने वाले
अपने गांव के टीले
रात को फूलों की तरह महक उठते हैं
और चांदनी में पगे हुए टोक के ढेरों पर लेटकर
स्वर्ग को गाली देना, बहुत संगीतमय होता है
हां, यह हमें याद रखना होगा क्योंकि
जब दिल की जेबों में कुछ नहीं होता
याद करना बहुत ही अच्छा लगता है

मैं इस विदाई के पल शुक्रिया करना चाहता हूं
उन सभी हसीन चीजों को
जो हमारे मिलन पर तंबू की तरह तनती रहीं
और उन आम जगहों को
जो हामरे मिलने से हसीन हो गई
मैं शुक्रिया करता हूं
अपने सिर पर ठहर जानेवाली
तेरी तरह हल्की और गीतों भरी हवा का
जो मेरा दिल लगाए रखती थी तेरे इंतजार में
रास्ते पर उगे हुए रेशमी घास का
जो तुम्हारी लरजती चाल के सामने हमेशा बिछ जाता था
टीण्डों से उतरी कपास का
जिसने कभी भी कोई उज्र न किया
और हमेशा मुस्कराकर हमारे लिए सेज बन गई
गन्नों पर तैनात पिद्दियों का
जिन्होंने आने-जानेवालों की भनक रखी
जवान हुए गेहूं की बल्लियों का
जो हमें बैठे हुए न सही, लेटे हुए तो ढंकती रहीं
मैं शुक्रगुजार हूं, सरसों के नन्हें फूलों का
जिन्होंने कई बार मुझे अवसर दिया
तेरे केशों से पराग केसर झाड़ने का
मैं आदमी हूं, बहुत कुछ छोटा-छोटा जोड़कर बना हूं
और उन सभी चीजों के लिए
जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा
मेरे पास बहुत शुक्राना है
मैं शुक्रिया करना चाहता हूं

प्यार करना बहुत ही सहज है
जैसे की जुल्म को झेलते हुए
खुद को लड़ाई के लिए तैयार करना
जा जैसे गुप्तवास में लगी गोली से
किसी गुफा में पड़े रहकर
जख्म के भरने के दिन की कल्पना करे

प्यार करना
और लड़ सकना
जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है
धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गुंज जाना-
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कबी न आएगा
जिन्हें जिन्दगी ने बनिया बना दिया

जिस्म का रिश्ता समझ सकना-
खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना-
जिंदगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना-
सहम को चीरकर मिलना और विदा होना-
बड़ा शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त.
मैं अब विदा लेता हूं
तुम भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों के भीतर पालकर जवान किया
कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने कितना खूबसूरत बना दिया तुम्हारा चेहरा
कि मेरे आलिंगनों ने
तुम्हारा मोम-जैसा शरीर कैसे सांचे में ढाला

तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त,
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहूत लोचा थी
कि मैं गले तक जिंदगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना, मेरी दोस्त,
मेरे भी हिस्से का जी लेना।

(पाश की कविता)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें