सोमवार, 25 अप्रैल 2011
दो पलों की सच्चाई ?
रोज मरता हूं मैं
एक पुरअसर जिंदगी के लिए
रोज देखता हूं तुम्हें
तुम्हारी अहमियत के लिए।
पिंजरे में कैद मेरा मन
और, सलाखों सा तुम्हारा वजूद
अपने ही सोच से
लहूलुहान हूं मैं
टेढ़ा या बाबला नहीं हूं मैं
सब किस्मत की बात है।
फर्क देखने-देखने का है
तुम्हें कुछ नजर आता हूं
दूसरों को कुछ और...
यूं हूं तो मैं वही एक
ठगा हुआ, नीचोड़ा हुआ सा।
जो कुछ अभी भी बाकी हैं
वो भी तुम्हारा ही है
जितना चाहे आजमा लो
पहले भी मेरा सर्वस्व तुम्हारा था
आज भी मैं तुम्हारा हूं
और, वक्त ने छल नहीं किया तो
आगे भी तुम्हारे लिए
करूंगा अपना सर्वस्व न्यौछावर
खैर, ये तो मेरी बात है
क्या तुम भी कबुल करोगी
मेरी कब्र पर आकर
साथ बिताए वक्तों से
दो पलों की भी सच्चाई ?
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