गुरुवार, 2 जून 2011

सो गई हैं सारी मंजिलें !

देर रात कहीं दूर तेजाब फिल्म का ये गीत बज रहा था...पहले भी कई बार इस गीत को सुना था मैंने, लेकिन पहली बार मद्धम-मद्धम आ रही गीतों के बोल मेरे अंतर में इतनी तेजी से उतरी थी... मानों पिघला हुआ कांच कानों से होते हुए दिल तक पहुंच गया हो....और उसमें मेरा सबकुछ गल गया हो, मेरा वजूद तक।

सो गई है सारी मंजिले....सो गया है रस्ता... कुछ ऐसा ही हाल है आजकल अपना...मंजिल और रास्ते दोनों समझ में नहीं आ रहे हैं, मेरी सोच मेरा ही साथ नहीं दे रही। मानो मेरा मस्तिष्क किसी और के लिए सोच रहा हो, मेरा दिल मेरी जगह किसी और की भावनाओं को संभालने में व्यस्त हो, मेरे खूद का अस्तित्व कहीं गुम हो गया हो। मैं क्या कर रहा हूं, कहां जा रहा हूं, सो रहा हूं, जग रहा हूं, काम कर रहा हूं, या फिर कुछ भी नहीं कर रहा हूं....कुछ भी होश नहीं है मुझे। न तो अपने भूत का आभाष है और न आनेवाले भविष्य की कोई फिक्र... और रही बात वर्तमान की बात, तो उसकी कोई खोज-ख़बर ही नहीं है...बस मैं लिख पा रहा हूं...वो भी नहीं जानता क्या-क्या लिख रहा हूं... कुछ मतलब भी है इसका या फिर बेमतल ही कीबोर्ड के की को दबाए चला जा रहा हूं।

एक शब्द है अंग्रेजी का Unconscious, जिसका हिंदी में शायद मतलब होता है अचेत...अचेत यानी की जब होश न हो...यानि बेहोश। बेहोश तो नहीं हूं मैं, लेकिन अपनी अवस्था को मैं होशपूर्ण भी नहीं मान सकता... क्योंकि मैं खुद को ही भूल चुका हूं... पूरी तरह न सही, आधा ही सही...क्या करूं...कोई उपाय भी नहीं आता...किसी से बात भी नहीं कर सकता...डर है, कहीं लोग मुझे पागल न समझ ले। पागलपन का ही तो ये लक्षण है, खूद को भूल जाना, अपनी सोच पर से कंट्रोल खो देना...मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा है...मैं सोना चाहता हूं...गहरी निंद्रा में....जहां भूल जाऊं कि मैं क्या हूं, जहां भूल जाऊं कि मैं सोच नहीं पा रहा हूं...जहां भूल जाऊं कि मैं कौन हूं...जहां भूल जाऊं कि मेरी भी कुछ ख्वाहशें हैं...जहां भूल जाऊं कि मैंने क्या खोया है और क्या नहीं पाया है। लेकिन मैं जानता हूं कि घंटे चार घंटे की नींद में ये संभव नहीं है....इसके लिए जरूरी है चिरनिंद्रा की....जो शायद मेरे चाहने से कभी न आए...कभी न आए। शायद, इसलिए मेरे लिए सभी रास्ते और मंजिले ही सो चुकी है...सो चुकी है।

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