मंगलवार, 7 जून 2011

18 साल बाद...


 18 साल बाद लौटा था वो....मिला था माता-पिता का प्यार.... घर में मनाई गई थी खुशियां, गांव वालों की दी गई थी पार्टी.....लेकिन अब फिर से दुमका के लखना गांव के चतुर्भूज यादव के घर कोहराम है....ऐसा मत सोचिएगा कि उसका खोया हुआ बेटा रविन्द्र फिर से कहीं खो गया है....बल्कि इस बार मामला जरा उल्टा है....जिस मां-बाप ने पिछले नौ महीने से उसे लख्त-ए-जिगर माना था....उन्होंने ही उसे पहचानने से इनकार कर दिया है....रविन्द्र के माता-पिता दोनों का कहना है कि रविन्द्र उनका खोया हुआ बेटा नहीं है.....ये कोई और है। 
रविंद्र की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी जैसी हो गई है....वो कहता है कि उन्नीस सौ तेरानवें में जब वो गुम हुआ था तो उसकी यादास्त चली गई थी....उसके पहले की जिंदगी के बारे में उसे कुछ याद नहीं....वो तो गुजरात में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रह रहा था....गांव के कुछ लोगों ने इसकी खबर चतुर्भूज यादव को दी औऱ फिर चतुर्भूज यादव ने अपने भतीजे को उसे लाने के लिए भेजा....फिर खुद गुजरात गए...और बेटे से वापस घर आने को कहा।
पिता की जिद ने उसे दुमका आने के लिए मजबूर कर दिया....जब वो घर लौटा तो गांव में उसके पिता ने भोज दिया....उसे सम्मान से घर में रखा....लेकिन नौ महीने के बाद उसके पिता को लगने लगा कि रविंद्र उसका बेटा नहीं है....और अब उन्होंने उसे घर से निकाल दिया है...उनकी माने तो ये पूरी कहानी उनकी संपत्ति हड़पने के लिए गांववालों की साजिश भर है।
जिस पिता ने रविंद्र के आने पर गांव में भोज दिया उन्होंने ही उसे अब घर से निकाल दिया है...गांववालों की माने तो रविंद्र चतुर्भूज यादव की ही बेटा है..अगर ऐसा नहीं है तो फिर उसकी शक्ल रविंद्र से क्यों मिलती है....और उसके पिता उसे लेने गुजरात क्यों गए थे। 
अब ये पूरा मामला गांव से निकलकर थाने तक पहुंच गया है और पुलिस पूरे मामले की जांच में जुट गई है.....कहानी पूरी फिल्मी हो चुकी है... रविंद्र बेघर हो गया है...और उसके पिता का घर एक बार फिर सूना हो गया...सवाल लाख टके का है रविंद्र कौन है....और अगर वो उनका खोया हुआ बेटा नहीं है तो फिर ये किसकी साजिश है। 
 

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