बुधवार, 31 अगस्त 2011

ख्वाहिश है...


ख्वाहिश है...
कि ख्वाहिशों की ईट से
ख्वाहिशों के महल की नींव रखूं।

ख्वाहिश है...
कि जेब में पड़ी चॉकलेट से
सजाऊं उनके हाथ की मेंहदी,
और, मेंहदी का रंग
नजर आए उनकी आंखों में
मेरी सुरत बनकर।

ख्वाहिश है...
कि बादलों का रूप धरकर
बरसूं उसके आंगन में खुशियां बनकर,
नज़र करूं
जब भी उनको
वो मेरी ही नज़र आए,
ठहर जाए वक्त उस पल
जब वो मेरे पास आए।

मैं कहता रहता
वो सुनती रहती
जो मन में आता, वो मैं बकता जाता
बिना थके वो चुपचाप सुनती
ज़ज्बातों की उस बारिश में
हममें से कोई भी न छतरी खोलता
भीगते हम दोनों बराबर
अपनी आह की बारिश में।

ख्वाहिश है...
कि सपनों का लिबास पहन
आंगन में उतरती वो परी माफिक
तब इश्क रात भर जलता रहता
और, चांदनी शर्माती छिपती फिरती।


ख्वाहिश है...
कि, उनकी हर ख्वाहिशों पर
कुरबां कर देता,
अपनी हर ख्वाहिश ।।


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