आज हम जिस कहानीकार, उपन्यासकार, नाटकाकार की शख्सियत से आपको रूबरू कराएंगे.... हिन्दी कथा लेखन में उनका जाना पहचाना नाम है.....हम बात कर रहे हैं सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी की.... आपका बंटी और महाभोज जैसे उपन्यासों की रचना के साथ ही मन्नू भंडारी ने हिन्दी कथा लेखन को एक नया आयाम दिया.... मन्नू भंडारी उन चुनिंदा रचनाकारों में से हैं जिनकी रचनाओं की तरह उनका ख़ुद का जीवन भी बेहद चर्चित रहा है और पाठकों की दिलचस्पी भी उसमें रही है....।
मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के भानपुरा गांव में हुआ था....उनके बचपना का नाम महेंद्र कुमारी थी....लेखक के रूप में महेंद्र कुमारी ने अपना नाम मन्नू भंडारी रख लिया....।
मन्नू भंडारी ने कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक और बीएचयू से एमए की डिग्री हासिल की... इसके बाद उन्होंने बालीगंज शिक्षा सदन और रानी बिड़ला कॉलेज में पढ़ाने का काम किया....1964 में वो दिल्ली के सुप्रसिद्ध कॉलेज मिरांडा हाऊस में हिन्दी की प्राध्यापक नियुक्त हुई और अवकाश ग्रहण करने तक यहां काम करती रही... रिटायर्ड होने के बाद उन्होने दो साल तक उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की निदेशक के रूप में काम किया।
मन्नू भंडारी की शादी हिन्दी के सुप्रसिद्द लेखक राजेंद्र यादव के साथ हुई थी....लेकिन उनकी शादी बहुत दिनों तक टिकी नहीं.... वो शांत भाव से राजेंद्र यादव से अलग हो गई... हालांकि राजेंद्र यादव के साथ उनकी दोस्ती अभी भी कायम है।
एक लेखिका के रूप में मन्नू भंडारी को सबसे पहले लोकप्रियता धर्मयुग में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित उपन्यास ‘आपका बंटी’ से मिली…. इसके बाद उन्होने पीचे मुड़कर नहीं देखा...लेखन का संस्कार मन्नू भंडारी को विरासत में मिला है... उनके पिता सुख सम्पतराय भी जाने माने लेखक थे।
मन्नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं... 1962 में एक प्लेट सैलाब.... 1957 में मैं हार गई..... 1966 में तीन निगाहों की एक तस्वीर और यही सच है, प्रकाशित हुई। त्रिशंकु और आंखों देखा झूठ उनके महत्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं।
विवाह विच्छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चे को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास `आपका बंटी’ हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है... लेखक राजेंद्र यादव के साथ 1962 में लिखा गया उनका उपन्यास एक इंच मुस्कान पढ़े-लिखे आधुनिक लोगों की एक दुखांत प्रेमकथा है...जिसका एक-एक अंक लेखक हृद्वय ने क्रमानुसार लिखा था। नौकरशाही में बढ़ते भ्रष्टाचार के बीच आम आदमी की पीडा़ और दर्द की गहराई को प्रदर्शित करने वाले उनके उपन्यास महाभोज पर आधारित नाटक अथ्यधिक लोकप्रिय हुआ था।
मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर एक फिल्म रजनीगंधा का भी निर्माण किया गयो जो काफी लोकप्रिय हुई.... 1974 में सर्वश्रेष्ट फिल्म का पुरस्कार जीतनेवाली फिल्म रजनीगंधा, यही सच है पर आधारित है....।
मन्नू भंडारी की अधिकांश कहानियों का टोन माईल्ड होता है... उनका ट्रीटमेंट भी बहुत धारदार नहीं होता... वे प्रायह मध्यमवर्गीय विवशताओं की कहानियां लिखती हैं, जिनमें पात्र कुछ न कर पाने की स्थिति में रहते हैं... उनमें एक प्रकार की निरीहता और परिस्थितियों के प्रति समर्पण का भाव दीखता है... ‘रेत की दीवार’ और ‘एखाने आकाशनाई” में इसी तरह की मूक निरीहता है... सब कुछ समझने, पर कुछ न कर पाने वाले पात्र। “रेत की दीवार’ में इसे भुगतता हुआ पुरूष है तो ‘एखाने आकाशनाई’ में स्त्री।
मन्नू भंडारी को हिन्दी अकादमी की तरफ से सम्मानित किया गया... साथ ही उन्हें दिल्ली का शिखर सम्मान, बिहार सरकार की तरफ से, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की तरफ से औक राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरष्कृत किया गया....उन्हें हिंदी साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक व्यास सम्मान से भी नवाजा गया है...।
मन्नू भंडारी वो शख्स हैं जिसने हिन्दुस्तान को आजाद होते देखा है...आजाद हिन्दुस्तान को बदलते देखा है... वो कहती है कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे तब पूरे अजमेर शहर में रोशनी की गई थी....वैसी रोशनी और वैसा जश्न उन्होंने फिर नहीं देखा..। तब टीवी तो था नहीं कि वहां रहते हुए अंग्रेजों के भारत को सत्ता सौंपते हुए देख सकती दिल्ली आना चाहती थी लेकिन आ नहीं पाई थी.... फिर भी मन में असीम खुशी थी। इसकी वजह यह भी थी कि उन्हें आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का मौका मिला था ....इंटर में दोनों सालों में वो आजादी की लड़ाई में काफी एक्टिव रही। सुबह निकल जाती थी प्रभात फेरियां करते हुए और फिर जुलूस और अन्य कार्यक्रमों में वो भाग लेती थी।
एक साक्षात्कार के दौरान मन्नू भंडारी ने कहा था कि उनका मानना है कि जब स्त्री टूटती-बिखरती है तब भी लेखन की सरलता वो इसलिए बनाए रख पाती है....क्योंकि संवेदनशीलता के स्तर पर वह बहुत गहरी होती है.....वो कहती है कि लेखन में भी पात्रों से उनका गहन जुड़ाव था जब 'आपका बंटी' खत्म हुआ तो लगा उनका अपना कोई उनसे बिछुड़ गया है.... वो ये भी कहती हैं कि उनकी कोशिश थी कि उनकी बेटी 'बंटी' ना बनने पाए।....लेकिन ये हो ना सका।
मन्नू भंडारी मानती है कि यदि लेखन में ताकत है तो आप बिखर नहीं सकते। लेखन ऐसी शक्ति है जो विपरीत परिस्थिति में भी साथ देती है.... वो कहती है कि लेखन ने उन्हें थामा इसलिए क्योंकि वो लेखनी को थाम सकी....वो ये भी कहती है कि उन्होंने अपनी पीड़ा किसी को नहीं बताई क्योंकि उनका मानना है कि व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख और अपने संघर्षों से वो अकेले जूझ सके।
मन्नू भंडारी आजकल न्यूरोलॉजिया नाम की बीमारी से पीड़ित हैं.... इस बीमारी को दूर करने की दवाई दिमाग को सुन्न कर देती है....जब मन्नू भंडारी आर्थिक और मानसिक कष्टों से गुजर रही थी तो वो खूब लिखती थी लेकिन शारीरिक कष्टों की वजह से अब उनका लेखन नहीं के बराबर हो पाता है... हालांकि अभी भी लिखने की उनकी इच्छा खत्म नहीं हुई है...और वो अपने साक्षात्कारों की एक संग्रह निकालना चाहती है।

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